अमेरिका- इजरायल के लगातार ईरान पर हमले जारी हैं. इन सबके बीच चीन हालात पर कड़ी नजर बनाए है, लेकिन उसके सीधे हस्तक्षेप की संभावना कम मानी जा रही है. चीन और ईरान के बीच ऊर्जा और रणनीतिक संबंध हैं, क्योंकि 2025 में चीन के कुल तेल आयात का लगभग 55 प्रतिशत मिडिल ईस्ट से आया, जिसमें करीब 13 प्रतिशत ईरान से था.
विश्लेषकों का मानना है कि हमलों से तेल आपूर्ति और होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले शिपमेंट पर असर पड़ सकता है, जिससे चीन चिंतित है. फिर भी बीजिंग ने अब तक केवल कूटनीतिक बयान दिए हैं और सभी पक्षों से सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है. बताया जा रहा है कि चीन अब ईरान को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में पहले जितना भरोसेमंद नहीं मानता. 2021 में दोनों देशों के बीच 400 अरब डॉलर का 25 वर्षीय समझौता हुआ था, लेकिन कई परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं. विशेषज्ञों के अनुसार चीन का मुख्य लक्ष्य तेल आपूर्ति बनाए रखना है, न कि किसी विशेष शासन का समर्थन करना.
पिछले साल हुए युद्ध में कैसा था रुख
बता दें कि जून 2025 में ईरान के खिलाफ इजरायल के 12 दिवसीय युद्ध के बाद चीन ने इस्लामी गणराज्य के समर्थन में केवल औपचारिक राजनयिक बयानबाजी की थी. इस सप्ताह चीनी विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सिर्फ अली खामेनेई की हत्या की निंदा पर ही ज्यादा जोर दिया गया. मंत्रालय द्वारा संबंधित पक्षों से सैन्य अभियान रोकने का आह्वान किया गया, जिसमें ईरान के साथ-साथ अमेरिका और इजरायल शामिल हैं. खाड़ी देशों की संप्रभुता, सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का मुखर समर्थन ये दर्शाता है कि चीन ईरान के साथ-साथ खाड़ी देशों के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.
ईरान की क्षमता और विश्वसनीयता संदेह में- चीन
7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजरायल पर हमले के बाद से बीजिंग तेहरान की क्षेत्रीय शक्ति के रूप में क्षमता और विश्वसनीयता को लेकर लगातार निराश होता जा रहा है. चीनी रणनीतिकारों का विश्वास इसलिए भी कम हो गया है क्योंकि ईरान पश्चिमी मांगों के आगे झुकने की प्रवृत्ति रखता है, न कि उनका मुकाबला करने की. वॉशिंगटन के साथ बातचीत करने की उसकी लगातार इच्छा से चीन को ऐसा लगता है. बीजिंग इसके साथ ही ईरान में सत्ता परिवर्तन को सबसे खराब स्थिति के रूप में नहीं देखता है. चीन हमलों के बाद उभरने वाले किसी भी नेतृत्व के साथ काम करने को तैयार है, बशर्ते वह तेल आपूर्ति की रक्षा करे और साझा आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे.
तेहरान को भी है ड्रैगन का खौफ!
साल 2021 में अपने बढ़ते सहयोग को और मजबूत करने के लिए दोनों देशों ने 25 साल के लिए 400 अरब डॉलर के रणनीतिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसका मकसद चीन-ईरान के आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को मजबूत करना था लेकिन समझौते के मुताबिक कुछ ही परियोजनाएं पूरी हो पाई हैं. तेहरान को चिंता है कि चीन का प्रभाव ईरानी संप्रभुता और स्वतंत्रता को खतरे में डाल देगा और बीजिंग तेहरान की अस्थिरता और अविश्वसनीयता से निराश है.
ईरान GDP में सऊदी से भी काफी पीछे
ईरानी जनसंख्या इजरायल से 10 गुना और सऊदी अरब से 3 गुना है, लेकिन इसके बावजूद उनकी जीडीपी इजरायल के 90 प्रतिशत से भी कम और सऊदी अरब के केवल 25 प्रतिशत के बराबर है. बीजिंग के अनुमान के अनुसार ईरान अपने विरोधियों को रोकने के लिए प्रॉक्सी वॉर का इस्तेमाल करता है, जिसने उसकी क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है और ईरान की आंतरिक कमजोरियों को छिपाया है.
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