बांग्लादेश में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवाल, हिंदू कैंडिडेट का नामांकन किया रद्द


बांग्लादेश में हालात स्थिर नहीं है. आए दिन अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रही घटनाएं दर्ज की जा रही है. मामला थमा नहीं है, लेकिन अब पड़ोसी मुल्क में राजनीतिक भेदभाव भी सामने आया है. इसने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने हिंदू उम्मीदवार का पर्चा रद्द कर दिया है. चुनाव में अपनी उम्मीदवारी दर्ज कराने के लिए जातीय हिंदू महाजोत के महासचिव और वरिष्ठ वकील गोबिंद चंद्र प्रामाणिक ने नामांकन भरा था. इसे रद्द कर दिया गया है. 

12 फरवरी को होने हैं बांग्लादेश में आम चुनाव

इंडिया टुडे के मुताबिक, गोबिंद चंद्र ने 28 दिसंबर को होने वाले आम चुनाव को नामांकन दाखिल किया था. यह पर्चा उन्होंने गोपालगंज-3 संसदीय क्षेत्र से नामांकन दाखिल किया था. यह सीट पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की रही है. बांग्लादेश में 12 फरवरी को चुनाव होने हैं. यहां से प्रामाणिक को एक मजबूत नेता माना जा रहा था. 

चुनाव आयोग ने नामांकन रद्द करने के फैसले पर क्या दलील दी?

चुनाव आयोग ने उनका नामांकन खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी निर्दलीय उम्मीदवार को नामांकन के साथ अपनी संसदीय क्षेत्र के कुल मतदाता संख्या के 1 प्रतिशत मतदाताओं के साइन करवाना जरूरी होता है. प्रामाणिक की मानें तो उन्होंने हस्ताक्षर जमा किए थे, लेकिन ऐन मौके पर चुनाव आयोग ने इन हस्ताक्षर को अमान्य कर दिया. 

गोबिंद चंद्र प्रामाणिक का आरोप है कि बीएनपी के इशारे पर हस्ताक्षर करने वाले लोग मुकर गए. इसके बाद चुनाव आयोग ने उनका नामांकन रद्द कर दिया. वह इस चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे. इसके अलावा उन्होंने अदालत जाने की बात भी कही है. 

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे सवाल

बांग्लादेश में चुनाव आयोग पर बीएनपी का समर्थन करने के आरोप लग रहे हैं. वहां के पत्रकार सलाहउद्दीन शोएब चौधरी ने कहा है कि देश की संस्थाएं बीएनपी को चुनाव जिताने में जुटी है. चुनाव आयोग पूरी कोशिश कर रहा है कि कोई निर्दलीय, जातीय दल अपने उम्मीदवार न उतारे. इससे बीएनपी को चुनौती का सामना न करना पड़े. 

प्रामाणिक कद्दावर नेता माने जाते हैं. वह हसीना सरकार गिरने के बाद युनूस सरकार का समर्थन करते नजर आए थे. तब वह विवादों में घिर गए थे. अब उनका नामांकन रद्द होने के बाद से बांग्लादेश के चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. 



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