भारतीयों के लिए टूटा अमेरिका का ख्वाब, लॉटरी सिस्टम खत्म, आज से बदल गए H-1B वीजा के नियम


अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने H-1B वर्क वीजा के लिए पुरानी रैंडम लॉटरी सिस्टम को खत्म करने का ऐलान कर दिया है. इसके बजाय एक नया ‘वेटेड सिलेक्शन’ सिस्टम लाया जाएगा, जो ज्यादा स्किल्ड और ज्यादा सैलरी वाले विदेशी वर्कर्स को प्राथमिकता देगा. यह बदलाव अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी, जॉब्स और वर्किंग कंडीशंस को बेहतर बनाने के लिए किया गया है.

नए नियम का नोटिफिकेशन जारी

US डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) और US सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) ने मंगलवार को यह नया नियम जारी किया है. USCIS के स्पोक्सपर्सन मैथ्यू ट्रेजेसर ने कहा, ‘पुराने रैंडम लॉटरी सिस्टम का फायदा उठाकर कई अमेरिकी कंपनियां कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स ला रही थीं, जो अमेरिकी वर्कर्स से कम पैसे पर काम करने को तैयार थे.’

नए नियम लागू होने से क्या बदलाव आएंगे?

  • अब वीजा सिलेक्शन रैंडम नहीं होगा, बल्कि वेटेड होगा.
  • सिलेक्शन में सैलरी स्तर के आधार पर वेट दिया जाएगा. ज्यादा सैलरी वाले जॉब ऑफर वाले एप्लिकेंट्स के चांस ज्यादा होंगे.
  • डिपार्टमेंट ऑफ लेबर (DOL) के तय 4 वेज लेवल्स होंगे. सबसे कम लेवल पर 1 एंट्री, सबसे ऊंचे लेवल पर 4 एंट्रीज. इससे हाई-पेड और हाई-स्किल्ड वर्कर्स को फायदा मिलेगा.
  • एनुअल कैप वही रहेगा यानी कुल 85,000 H-1B वीजा (65,000 जनरल + 20,000 एडवांस्ड डिग्री वालों के लिए).
  • यह नियम 27 फरवरी 2026 से लागू होगा और फिस्कल ईयर 2027 के H-1B कैप रजिस्ट्रेशन सीजन से शुरू होगा.

ट्रंप सरकार ने यह फैलसा क्यों लिया?

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि पुराने सिस्टम का गलत इस्तेमाल हो रहा था. कंपनियां एंट्री-लेवल जॉब्स दिखाकर कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स लाती थीं, भले ही उनके पास ज्यादा एक्सपीरियंस हो. इससे अमेरिकी वर्कर्स की जॉब्स और सैलरी पर असर पड़ता था. नया सिस्टम अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी के तहत है, जो हाई-स्किल्ड टैलेंट को बढ़ावा करेगा.

भारतीय वर्कर्स पर क्या असर पड़ेगा?

भारतीय प्रोफेशनल्स H-1B वीजा के सबसे बड़े यूजर्स हैं. इस बदलाव से एंट्री-लेवल या कम सैलरी वाले युवा भारतीयों के लिए वीजा मिलना मुश्किल हो जाएगा. वहीं, हाई-पेड और सीनियर रोल्स वाले एक्सपीरियंस्ड वर्कर्स को फायदा होगा. इस साल अमेजन सबसे ज्यादा (10,000+) H-1B वीजा लेने वाली कंपनी थी, उसके बाद TCS, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल और गूगल.



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