‘महाराष्ट्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाए…’, जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान


जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने 7/11 के मुंबई लोकल ट्रेन विस्फोट मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की ओर से सभी 12 आरोपियों को बरी करने के फैसले का स्वागत किया है. इसके साथ महाराष्ट्र सरकार के सुप्रीम कोर्ट में फैसले को चुनौती देने के फैसले की निंदा की है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (21 जुलाई, 2025) को दिए गए फैसले में 2015 की दोषसिद्धि को पलट दिया.

इस संबंध में जमात-ए-इस्लामी हिंद का कहना है कि हालिया फैसले में जांच संबंधी गंभीर चूक और निर्णायक साक्ष्यों की कमी को उजागर किया गया है, जिससे आपराधिक न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं.

जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने जारी किया बयान

जमात के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने एक बयान जारी कर कहा, “हम बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं, जिसमें उन 12 व्यक्तियों को बरी कर दिया गया है जिन्हें लगभग दो दशकों तक अन्यायपूर्ण ढंग से जेल में रखा गया. अभियोजन पक्ष की ओर से मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफलता और दबाव में प्राप्त किए गए बयानों सहित साक्ष्यों की अविश्वसनीयता के बारे में अदालत की तीखी टिप्पणियां हमारी जांच प्रक्रियाओं में प्रणालीगत खामियों को उजागर करती हैं.”

उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ता (ATS) बुनियादी विवरण भी स्थापित करने में विफल रहा जैसे कि इस्तेमाल किए गए बमों के प्रकार और संदिग्ध गवाहों के बयानों और गलत तरीके से संभाले गए, साक्ष्यों पर भरोसा किया. यह सिर्फ एटीएस की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की सामूहिक विफलता है, जिसके कारण अभियुक्तों और उनके परिवारों को भारी कष्ट उठाना पड़ा है.”

धमाकों में गई थी 189 लोगों की जान

मोतसिम खान ने बरी किए गए लोगों के साथ हुए घोर अन्याय पर जोर देते हुए कहा, “इन लोगों को, जिन्होंने 19 साल जेल में बिताए, उन्हें उत्पीड़न और यातना का सामना करना पड़ा, जैसा कि हाई कोर्ट ने कहा है. उनके परिवारों को कलंकित किया गया है और उनके जीवन को अपूरणीय क्षति पहुंचाई गई है. इन गंभीर गलतियों को स्वीकार करने और बरी हुए लोगों को उनके कष्ट के लिए मुआवजा देने के बजाए महाराष्ट्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर रही है. यह कदम अदालत के निष्कर्षों की अवहेलना करता है और वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाता है.”

11 जुलाई, 2006 को 11 मिनट के अंतराल में मुंबई की लोकल ट्रेन में हुए सीरियल धमाकों में 189 लोगों की मौत हुई थी और 800 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. 

मलिक मोतसिम ने विस्फोट के पीड़ितों के लिए न्याय को प्राथमिकता देने का किया आग्रह

मलिक मोतसिम ने सरकार से विस्फोटों के पीड़ितों के लिए न्याय को प्राथमिकता देने का आग्रह करते हुए कहा, “7/11 के हमलों में मारे गए और घायल हुए लोगों के परिवारों को न्याय मिलना चाहिए, जो 19 साल बाद भी नहीं मिल पाया है. हाई कोर्ट के 671 पन्नों के फैसले से अभियोजन पक्ष के दोष सिद्ध करने में असमर्थता उजागर होती है, जिससे यह सवाल उठता है कि इस जघन्य अपराध को किसने अंजाम दिया.”

उन्होंने कहा, “एक सुविचारित निर्णय के खिलाफ अपील करने में संसाधन बर्बाद करने के बजाए, महाराष्ट्र सरकार को वास्तविक दोषियों की पहचान करने और उन्हें न्याय के कटघरे में लाने के लिए गहन पुनर्जांच पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. वास्तविक अपराधियों को दंडित करना कानून के शासन को बनाए रखने और जन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है.”

जमात के उपाध्यक्ष ने व्यवस्थागत सुधारों का किया आह्वान

जमात के उपाध्यक्ष ने व्यवस्थागत सुधारों का आह्वान करते हुए कहा, “19 साल बाद बरी होना आतंकवाद मामलों की जांच में विफलताओं के इतिहास को उजागर करता है. हमें न्याय की और अधिक विफलताओं को रोकने के लिए सामूहिक रूप से इन कमियों को दूर करना होगा. सरकार को बरी किए गए लोगों को मुआवज़ा देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच में ऐसी चूक दोबारा न हो.”

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