मैसूर दशहरा समारोह का उद्घाटन मुस्लिम महिला से करवाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले पर रोक से किया था मना


मैसूर दशहरा समारोह की शुरुआत एक गैर हिंदू से करवाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराने वाले कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश को एक याचिकाकर्ता ने चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 19 सितंबर को सुनवाई की बात कही है.

याचिकाकर्ता एच एस गौरव की तरफ से मामला कोर्ट में रखते हुए उनके वकील ने कहा कि इस समारोह की शुरुआत चामुंडेश्वरी देवी की परंपरागत पूजा से होती है. राज्य सरकार एक मुस्लिम महिला को मंदिर में आमंत्रित कर उनसे कार्यक्रम का उद्घाटन करवाने जा रही है. यह सीधे-सीधे धार्मिक मामलों में दखल है. 

याचिकाकर्ता के वकील ने 22 सितंबर से कार्यक्रम की शुरुआत का हवाला देते हुए शुक्रवार को सुनवाई का अनुरोध किया. चीफ जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई इससे सहमति जताई. इससे पहले 15 सितंबर को कर्नाटक हाई कोर्ट ने मामले में दखल देने से मना कर दिया था.

कर्नाटक सरकार ने पुलित्जर अवॉर्ड से सम्मानित लेखिका बानू मुश्ताक 2025 के दशहरा उत्सव की मुख्य अतिथि और उद्घाटनकर्ता के रूप में आमंत्रित किया है. इसके खिलाफ हाई कोर्ट में कुछ याचिकाएं दाखिल हुई थीं. उनमें कहा गया था कि दशहरा का उद्घाटन एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि नहीं है. यह एक पवित्र अनुष्ठान है, जो हिंदू धार्मिक प्रथाओं और परंपराओं के अनुसार होता है. इसमें दीप जलाना, देवी को पुष्प अर्पित करना समेत कई विधि-विधान शामिल हैं.

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि इतिहास में कभी भी किसी गैर हिंदू ने दशहरा कार्यक्रम की शुरुआत नहीं की. राज्य सरकार का यह कदम लाखों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है. साथ ही, यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में दिए धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक मामलों के प्रबंधन के अधिकार का उल्लंघन है.

कर्नाटक हाई कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज कर दिया था. हाई कोर्ट ने कहा था कि बानू मुश्ताक को निमंत्रण अनुच्छेद 25 या 26 का उल्लंघन नहीं करता है. दशहरा उत्सव राज्य सरकार आयोजित करती है. वह इसमें प्रतिष्ठित व्यक्तियों को बुला सकती है, चाहे वह किसी भी धर्म के हों. इस मामले में याचिकाकर्ता के किसी अधिकार का हनन नहीं हो रहा है.



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