लिव-इन रिलेशन में दहेज उत्पीड़न कानून लागू हो सकता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट करेगा इस पर विचार


सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि लिव-इन रिलेशन में दहेज उत्पीड़न कानून लागू हो सकता है या नहीं. कर्नाटक के एक डॉक्टर की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस सवाल को अहम माना. डॉक्टर का कहना है कि उनकी शिकायतकर्ता महिला से शादी नहीं हुई. इसके बावजूद कर्नाटक हाई कोर्ट ने महिला की तरफ से दर्ज धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के केस को रद्द करने से मना कर दिया.

शीर्ष अदालत के जस्टिस संजय करोल और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने जिस याचिका पर यह सुनवाई शुरू की है, उसे कर्नाटक के शिवमोगा के रहने वाले हृदय रोग विशेषज्ञ लोकेश बी एच और उनके परिवार के 3 सदस्यों ने दाखिल किया है. याचिका में बताया गया है कि जिस महिला ने उनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज करवाया है, वह कानूनी तौर पर डॉक्टर की पत्नी नहीं है. महिला ने उन्हें परेशान करने के लिए और भी दूसरे कैसे डर से करवा रखे हैं.

SC ने कानून मंत्रालय और कर्नाटक सरकार को जारी किया नोटिस

मामले को सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज संबंधी कानून की भाषा स्पष्ट रूप से ‘पति’ और ‘पत्नी’ शब्दों का इस्तेमाल करती है. ऐसे में यह तय करना जरूरी है कि क्या लिव-इन रिश्ते को भी विवाह के बराबर माना जा सकता है. कोर्ट ने मामले में केंद्रीय कानून मंत्रालय और कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी किया है. साथ ही, वकील नीना नरीमन को मामले में सहायता के लिए एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है.

9 मार्च को होगी अगली सुनवाई

जजों ने कहा कि इस तरह के मामलों को लेकर अलग-अलग हाई कोर्ट ने अलग-अलग राय दी है. कुछ हाई कोर्ट ने माना है कि अगर लिव-इन संबंध विवाह जैसे स्वरूप में हो और महिला को रिश्ते की गंभीरता पर भरोसा दिलाया गया हो तो उत्पीड़न कानून लागू हो सकता है. वहीं दूसरे हाई कोर्ट ने कहा है कि जब तक कानूनी विवाह न हो, तब तक धारा 498A नहीं लगाई जा सकती. ऐसे में इस विषय की विस्तृत कानूनी व्याख्या ज़रूरी हो जाती है. इसलिए, सुप्रीम कोर्ट मामले पर विचार करेगा. मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी.



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