गुरुग्राम में चार साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले की जांच कर रही स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (SIT) को सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से पूछताछ के वक्त सिविल ड्रेस में रहने का आदेश दिया है. यह भी कहा है कि बच्ची के सामने उनकी पहचान उजागर न हो. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि एसआईटी फिर से बच्ची से आरोपी की पहचान करवाना चाहती है, जबकि उसको फिर उसी ट्रॉमा से गुजारने की जरूरत नहीं है. पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने जांच में लापरवाही, पीड़ित परिवार को प्रताड़ित करने और पूछताछ के दौरान बच्ची के साथ असंवेदनशील रवैया रखने के लिए हरियाणा पुलिस को खूब फटकार लगाई थी.
कोर्ट ने पिछली सुनवाई में पुलिस की जांच पर असंतुष्टी जताते हुए तीन महिला आईपीएस अधिकारियों की एसआईटी बनाई थी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि इस मामले को कोर्ट की संविधान पीठ के सामने रखा जाएगा. बेंच ने कहा कि यह पूरे देश के लिए आंख खोलने वाली घटना है. हमें इस मामले को देखते हुए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी करने की जरूरत है.
सीजेआई सूर्यकातं की बेंच के सामने सोमवार (6 अप्रैल, 2026) को याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि जब नाबालिग पीड़िता आरोपी को पहचान चुकी है, तो फिर से उसको उसी प्रक्रिया से गुजारकर वही ट्रॉमा देने की क्या जरूरत है. उन्होंने अपील की कि आरोपी को पहचनाने की प्रक्रिया फिर से न हो. मुकुल रोहगती ने यह भी कहा कि कोर्ट ने पूछताछ के समय महिला मजिस्ट्रेट की मौजूदगी का आदेश दिया था, लेकिन अब भी पुरुष मजिस्ट्रेट वहां मौजूद हैं.
मुकुल रोहतगी ने आगे कहा कि अब भी मामला पोक्सो एक्ट के सेक्शन 6 के तहत दर्ज नहीं किया गया है. अगर बाद में सेक्शन 6 को जोड़ा जाता है तो उसमें बहुत देर हो चुकी होगी क्योंकि आरोपियों को तब तक जमानत मिल चुकी होगी. हरियाणा की तरफ से एडशिनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि जांच चल रही है और एसआईटी को जांच के लिए दो हफ्तों का समय दिया जाए. उन्होंने यह भी बताया कि पहले जो लोग जांच कर रहे थे, उन्होंने बच्ची से आरोपियों को पहचानने की बात कही थी, लेकिन एसआईटी को इसकी जरूरत नहीं है.
एएसजी भाटी ने कहा कि एसआईटी अधिकारी सिर्फ बच्ची से मिलना चाहते हैं. अब तक उन्होंने सिर्फ बच्ची के माता-पिता से ही बात की है. उन्होंने कहा कि एसआईटी अधिकारी बच्ची के लिए एक चाइल्ड साइकाइट्रिस्ट भी चाहते हैं. इस पर कोर्ट ने आदेश दिया कि एसआईआटी अधिकारी यूनिफॉर्म में बच्ची से न मिलें और न ही बच्ची के सामने उनकी पहचान उजागर होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमें एसआईटी की अपील भी जायज लगती है इसलिए उन्हें जांच पूरी करने के लिए दो हफ्तों का समय दिया जाता है. कोर्ट ने कहा कि एसआईटी अधिकारी और बच्ची के वकील अपनी पहचान उजागर किए बगैर उससे सिविल ड्रेस में मिलें. कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई नहीं की जाएगी.
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर पर भी सख्त टिप्पणी की थी कि गुरुग्राम पुलिस के अधिकारियों ने जानबूझकर उन सबूतों को नजरअंदाज किया, जो पोक्सो एक्ट के सेक्शन 6 के तहत मामले को दर्ज करने के लिए पर्याप्त थे, लेकिन अधिकारियों ने जानबूझकर मामले को सेक्शन 10 के तहत दर्ज किया, जिसमें कम गंभीर अपराध आते हैं.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया था कि बच्ची को बार-बार पुलिस स्टेशन, अस्पताल और बाल कल्याण समिति ले जाया गया. यूनिफॉर्म में पुलिस वाले उसके पास आते रहे और पहचान के लिए उसको आरोपियों के सामने सामने खड़ा किया गया, जबकि यह प्रक्रिया आरोपियों के फोटो के जरिए की जा सकती थी.
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