40 दिनों की भीषण सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम लागू हुआ है, लेकिन हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं. अब इस हफ्ते पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर है, जहां बातचीत से ज्यादा टकराव की आशंका दिख रही है.
व्हाइट हाउस ने साफ कर दिया है कि अमेरिका अपने रुख से पीछे हटने वाला नहीं है. प्रेस सचिव ने कहा, “राष्ट्रपति की लाल रेखाएं, यानी ईरान में यूरेनियम संवर्धन का अंत नहीं बदली हैं.” साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब वैश्विक ऊर्जा मार्ग पूरी तरह खुले रहेंगे,”बिना किसी सीमा या देरी के.”
सीजफायर के बाद भी जमीन पर तस्वीर अलग
सीजफायर के बाद भी जमीन पर तस्वीर अलग है. इजरायल लगातार लेबनान पर हमले कर रहा है. अमेरिका ने भी साफ कहा, “लेबनान युद्धविराम का हिस्सा नहीं है.” यही मुद्दा अब सबसे बड़ा विवाद बन गया है. ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिका को सीधे चेतावनी दी. उनका कहना है, “अमेरिका को चुनना होगा या तो युद्धविराम या फिर इजरायल के जरिए जारी युद्ध. वह दोनों नहीं रख सकता.” उन्होंने आगे कहा, “अब गेंद अमेरिका के पाले में है और दुनिया देख रही है कि वह अपने वादों पर कितना खरा उतरता है.”
बातचीत की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाक़ेर क़ालिबाफ ने तो बातचीत की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठा दिए. उन्होंने कहा, “जिस ठोस आधार पर बातचीत होनी थी, उसे बातचीत शुरू होने से पहले ही खुलेआम और स्पष्ट रूप से तोड़ दिया गया है.” अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस बातचीत का नेतृत्व करेंगे. इस बीच अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान ने भी सख्त संकेत दिए हैं कि ईरान को अपना संवर्धित यूरेनियम सौंपना होगा, वरना उसे हटाकर अपने कब्जे में ले लिया जाएगा. तनाव यहीं खत्म नहीं होता. अमेरिकी पक्ष का दावा है कि लेबनान को लेकर कोई ऐसा कोई वादा कभी नहीं किया गया था. यानी दोनों पक्ष अलग-अलग समझ के साथ बातचीत की मेज पर बैठने जा रहे हैं. पाकिस्तान की यह बातचीत सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं, बल्कि युद्ध और शांति के बीच की निर्णायक लड़ाई बन चुकी है. अब देखना यह है कि क्या बातचीत से रास्ता निकलेगा या मध्य पूर्व एक और बड़े संघर्ष की तरफ बढ़ेगा.
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