ईरान में तख्तापलट की राह आसान नहीं, क्यों खामेनेई जंग की सूरत में भागने की बजाय शहादत चुनेंगे?


ईरान पिछले करीब 20 दिन से उबल रहा है. देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई के खिलाफ लाखों लोग सड़क पर हैं. हजारों लोगों की मौत हो चुकी है. इसमें ट्रंप भी दखल दे चुके हैं. अमेरिका प्रदर्शनकारियों के साथ आ गया है. खुद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशेकियान प्रदर्शनकारियों के समर्थन में बयान दे रहे हैं. इसके बावजूद ईरान में कोई तख्ता पलट नहीं हो पाया है और अभी दूर-दूर तक इसके आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं.

आखिर ईरान में अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई के खिलाफ चल रहा प्रदर्शन इतना घातक क्यों नहीं हो पा रहा कि खामेनेई झुक जाएं. आखिर खामेनेई के पास कौन सी ऐसी ताकत है, जो उन्हें बचा रही है. आखिर 1979 में वो कौन से हालात थे कि ऐसे ही प्रदर्शनों में शाह रजा पहलवी का तख्ता पलट करके अयातुल्लाह रुहोल्ला खुमैनी ने ईरान में इस्लामिक क्रांति कर दी थी. आखिर तब में और अब में क्या फर्क है.

साल 2024 की शुरुआत से ही ईरान के लोग बढ़ती महंगाई, रियाल की गिरती कीमतें, बिजली और गैस की बाधित होती सप्लाई से परेशान होना शुरू हो गए थे. पानी की भी किल्लत शुरू हो गई थी, जिसने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था. बची-खुची कसर अमेरिका और ईरान के झगड़े के दौरान पूरी हो गई, जब अमेरिकी हमले में ईरान का न्यूक्लियर प्लांट तबाह हो गया.

ईरान की सड़कों पर कौन से नारे गूंज रहे?

इसके बाद तो ईरान आर्थिक तौर पर ऐसा कमजोर हुआ कि वहां के लोग ही सड़क पर उतर आए. इसकी शुरुआत हुई 28 दिसंबर 2025 को ईरान की राजधानी तेहरान से, जहां दुकानदारों ने ग्रैंड बाजार में प्रदर्शन शुरू किया जो धीरे-धीरे यूनिवर्सिटी तक पहुंच गया. हालांकि शुरुआत में ये प्रदर्शन बेहद छोटे स्तर के थे. इसमें सरकार विरोधी नारों के बीच एक और नारा उछलना शुरू हुआ “Neither Gaza nor Lebanon, My Life for Iran”,

यानी कि न तो गाजा से मतलब है और न ही लेबनान से. हम तो ईरानी हैं और हमें सिर्फ ईरान से ही मतलब होना चाहिए. ये नारा इसलिए उछला था, क्योंकि इजरायल और गजा के बीच चल रहे संघर्ष में ईरान ने खुद को भी शामिल कर लिया था. लेबनान के ग्रुप हेजबोल्लाह के जरिए ईरान इजरायल के खिलाफ अप्रत्यक्ष जंग लड़ रहा था और इसकी जो भी कीमत थी, वो आम ईरानी चुका रहे थे तो उन्होंने खुद को दूसरे मुल्कों से अलग किया और नारा दिया. “Neither Gaza nor Lebanon, My Life for Iran”

एक हफ्ते के अंदर-अंदर पहले ईरान के बड़े शहर और फिर पूरा ईरान ही आंदोलन के लिए सड़क पर उतर आया. प्रदर्शनकारियों की मांगे बदल गईं और अब लोग ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई से आजादी की मांग करने लगे. तो फिर सड़क पर ईरानी सेना भी उतर आई. खामेनेई के आदेश पर ईरानी सेना ने सख्ती शुरू की, लाठियां चलाईं और बात नहीं बनी तो गोलियां भी चलानी शुरू कीं.

मरने वालों की संख्या 3 हजार के पार

ईरान की सरकार के मुताबिक सेना की गोलीबारी में 2500 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि अलग-अलग आंकड़े मरने वालों की संख्या को 3 हजार से लेकर 10 हजार के बीच बता रहे हैं. सेना के भी 100 से ज्यादा जवानों की भीड़ ने हत्या कर दी है, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों पर और भी सख्ती बरती जा रही है और कुछ प्रदर्शनकारियों के लिए बिना किसी केस-मुकदमे के खुलेआम फांसी की भी सजा तय कर दी गई है.

खुद राष्ट्रपति मसूद पजशेकियान का भी रुख बदल गया है और वो प्रदर्शनकारियों की बात मानने की बात करने लगे हैं. प्रदर्शनकारियों को खुद ट्रंप भी उकसा रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें ईरान की सरकारी इमारतों को कब्जे में लेना चाहिए, अमेरिका इसमें मदद करेगा और वो मदद रास्ते में है. जिस शाह रजा पहलवी का तख्तापलट कर इस्लामिक क्रांति हुई थी और अयातुल्लाह रुहोल्ला खुमैनी ने ईरान पर शासन शुरू किया था, उनके बेटे रजा पहलवी भी ईरान की सेना को प्रदर्शनकारियों के साथ आने की सलाह दे रहे हैं.
 
हालांकि इस कत्ल-ए-आम के बावजूद अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई की सेहत पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा है. इसकी कुछ ऐसी चुनिंदा वजहे हैं, जिन्हें अमेरिका भी नजरंदाज नहीं कर सकता है, लिहाजा वो डायरेक्ट ऐक्शन से बच रहा है.

1. ईरान के अंदर प्रदर्शनकारियों का नेता कौन

यही सबसे बड़ा सवाल है जिसका जवाब न मिल पाने की वजह से अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. क्योंकि ईरान के प्रदर्शनकारियों के नेता ईरान के अंदर भी हैं और बाहर भी और उन दोनों के बीच कोई तालमेल नहीं है. जहां प्रदर्शन हो रहे हैं यानी कि ईरान में, वहां इन्हें कौन लीड कर रहा है, कोई नहीं जानता. अगर खामेनेई सत्ता छोड़ भी देते हैं तो इन प्रदर्शनकारियों में ऐसा कौन है जो ईरान की सत्ता को संभालेगा, कोई नहीं जानता.

इसकी वजह ये है कि ईरान में जब भी प्रदर्शन हुए हैं और किसी ने उनका नेता बनने की कोशिश की है, उसे ईरान की सरकार ने ऐसा कुचला है कि वो कभी उभर नहीं पाया. उदाहरण के तौर पर जून 2009 में जब ईरान में तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदिनेजाद की जीत के ठीक बाद जब प्रदर्शन हुए तो उस प्रदर्शन के नेता मीर-हुसैन मोसावी बने थे.

मोसावी पहले भी ईरान के प्रधानमंत्री रह चुके थे और 2009 के चुनाव में वो खुद राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे, लेकिन मोसावी जब चुनाव हार गए तो उन्होंने चुनावी नतीजों को मानने से इनकार कर दिया. जब प्रदर्शन शुरू हुए तो वो उसके नेता बन गए और फिर फरवरी 2011 में उन्हें हिरासत में ले लिया गया. उन्हें घर में नजरबंद कर दिया गया और तब से लेकर आज तक वो नजरबंदी से बाहर नहीं आ पाए हैं.

इस आंदोलन के एक और नेता महदी करौबी थे. उन्होंने भी चुनावी नतीजे मानने से इंकार कर प्रदर्शन में भाग लिया था. 2011 में उन्हें भी घर में नजरबंद किया गया तो 14 साल के बाद अभी मार्च 2025 में ईरानी सेना ने उनकी नजरबंदी हटाई है. ये दोनों ही उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि अगर अभी ईरान में चल रहे प्रदर्शन में कोई भी नेता बनकर उभरा तो उसका भी हश्र वही होगा जो मोसावी का हुआ या जो करौबी का हुआ इसलिए आंदोलन सब कर रहे हैं.

लोग जुट रहे हैं नेटवर्गिंक के जरिए. इंटरनेट बैन है तो भीड़ अलग-अलग समूहों में जुट रही है. छात्रों के समूह हैं, कारोबारियों के समूह हैं, दुकानदारों के समूह हैं सब छोटे-छोटे ग्रुप्स बनाकर सड़क पर उतर रहे हैं तो भीड़ बड़ी हो जा रही है. गेमिंग ऐप डिस्कॉर्ड के जरिए भी लोग एक दूसरे से कनेक्ट करके आंदोलन में शरीक हो रहे हैं, लेकिन इनका कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं है. लिहाजा अयातुल्लाह खामेनेई को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है.

2. ईरान के बाहर प्रदर्शनकारियों का नेता कौन

इस सवाल का भी कोई ठीक-ठीक जवाब किसी के पास नहीं है. हां एक नाम है, जो मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए ईरान के लोगों से संवाद कर रहा है, जिसका नाम है रजा पहलवी. रजा पहलवी ईरान के सुल्तान रहे रजा शाह पहलवी के बेटे हैं. 1979 में जब इस्लामिक क्रांति हुई तो आंदोलन के दौरान यही रजा शाह पहलवी ईरान छोड़कर भाग गए थे. तब अयातुल्लाह खुमैनी ने ईरान पर अपना शासन शुरू किया था. रजा पहलवी इन्हीं रजा शाह पहलवी के बेटे हैं, जो अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं. वो अमेरिका में रहकर ही ईरान नेशनल काउंसिल चला रहे हैं.

अमेरिका भी रजा पहलवी को चाहता है और रजा को इजरायल का भी समर्थन है, लेकिन अभी तय नहीं है कि अगर खामेनेई शासन का अंत होता है तो ईरान में राजशाही की वापसी होगी और रजा पहलवी ही नए राजा बनेंगे. क्योंकि ईरान में जो रिपब्लिकन और लेफ्ट ग्रुप्स हैं वो खामेनेई के साथ-साथ रजा पहलवी की भी मुखालफत कर रहे हैं. ऐसे में अभी अयातुल्लाह होसैनी खामेनेई खुद के लिए रजा पहलवी को किसी मुसीबत के तौर पर नहीं देख पा रहे हैं.

3. ईरान के मुजाहिदों का नेता कौन

ईरान में मुजाहिदिनों का भी एक संगठन है, जिसका नाम पीपल्स मुजाहिदीन ऑर्गनाइजेशन है. इसका पर्शियन नाम है मुजाहिदीन-ए-खल्क ऑर्गनाइजेशन. शॉर्ट फॉर्म में इसको MEK या MKO भी कहते हैं. ये ईरान की वो वामपंथी संस्था है, जिसने 1979 में भी शाह रजा पहलवी के खिलाफ हुए आंदोलन में बमबाजी की थी. 70 के दशक में जब अमेरिका ने ईरान में दखल दिया था, तब भी इन मुजाहिदों ने अमेरिका से लड़ाई की, लेकिन ये कभी सत्ता के दावेदार नहीं रहे. क्योंकि 1980 के दौर में जब ईरान और इराक के बीच जंग हुई थी तो इस संगठन ने इराक का साथ दिया था और ईरान के आम लोग इस बात के लिए कभी भी मुजाहिदीन-ए-खल्क को माफ नहीं कर सकते हैं.

इस ग्रुप के नेता रहे हैं मसूद रजावी जो ईरान से निर्वासित होकर पहले फ्रांस और फिर इराक चले गए थे. पिछले 20 साल से वो कभी नजर नहीं आए हैं. उनकी पत्नी मरियम रजावी ईरान को लेकर एक संगठन चला रही हैं जिसे नेशनल काउंसिल ऑफ रेजिसटेंस कहा जा रहा है, लेकिन इनकी पहुंच फ्रांस और अल्बानिया जैसे पश्चिमी देशों तक ही सीमित है.

बाकी तो और भी छोटे-छोटे समूह हैं जो विरोध प्रदर्शन में शामिल हैं या पहले भी शामिल होते रहे हैं, लेकिन पैन ईरान उनकी ऐसी कोई स्वीकार्यता नहीं है कि अयातुल्लाह खामेनेई को उनसे कोई खतरा होगा. जैसे 2022 में जब ईरान में हिजाब वाले विवाद में ईरानी पुलिस ने महसा अमीनी की हत्या कर दी तो उसके बाद ईरान के बाहर बैठे ईरानी लोगों ने एक मोर्चा बनाया जिसे नाम दिया गया सेक्युलर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक इन ईरान.

ईरान में तख्तापलट की कहानी

इस मोर्चे ने धर्म और राज्य को अलग करने की वकालत की, स्वतंत्र चुनाव करवाने की वकालत की, एक निष्पक्ष न्यायपालिका और मीडिया स्थापित करने की वकालत की, लेकिन ईरान के लोगों ने ही इस मोर्चे को मान्यता नहीं दी और ये मोर्चा कुछ नहीं कर पाया. बाकी तो ईरान में कुछ कुर्द हैं, कुछ बलोच हैं, कुछ अजरबैजान के लोग हैं. इनका सबका अपना-अपना समूह है, लेकिन ये इस हैसियत में नहीं हैं कि ईरान की सत्ता पर इनका दखल हो. नतीजा वहीं खामेनेई इनकी ओर से निश्चिंत हैं.

अब रहा सवाल कि 1979 में ऐसा क्या हुआ था कि आंदोलन शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद शाह को भागना पड़ा था और ईरान में तख्तापलट हो गया था. दरअसल उस वक्त भले ही अयातुल्लाह रुहोल्ला खुमैनी निर्वासन में थे, लेकिन क्रांति के वो इकलौते नायक भी थे, जिनको लेकर ईरान में कोई दो राय नहीं थी. बाकी दूसरी बड़ी वजह सुल्तान मोहम्मद रजा शाह पहलवी की सेहत भी थी, जिसकी वजह से उनकी सक्रियता कम हो गई थी. उन्हें तब कैंसर था और इलाज के लिए उन्हें बार-बार ईरान छोड़कर जाना पड़ता था. बीच प्रदर्शन के दौरान रजा शाह पहलवी इलाज के लिए विदेश चले गए, जिसकी वजह से आंदोलन को कुचलने की कोई कोशिश नहीं हुई.

ईरान की जो पुलिस थी, वो सामाजिक व्यवस्था बना रही थी. जो सेना थी जो बॉर्डर की सुरक्षा में लगी थी. बस शाह का जो खुफिया संगठन था सावाक, वही आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वो प्रभावी नहीं था और जब शाह विदेश चले गए तो फिर किसी ने भी इस आंदोलन को दबाने की कोशिश नहीं की. सबको सिर्फ अपनी-अपनी पड़ी थी और फिर वही हुआ जो होना था. खुमैनी जब तेहरान में वापस आए तो लाखों लोगों का हुजूम जुट गया और ईरान में शाह का तख्तापलट हो गया.

खामेनेई के पास ईरान छोड़ने का ऑप्शन नहीं

जबकि उम्रदराज होने के बावजूद अयातुल्लाह अली हौसेनी खामेनेई की पकड़ न सिर्फ खुफिया तंत्र पर बल्कि सेना और पुलिस पर भी बरकरार है. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में व्यवस्था ही ऐसी बनाई गई कि सेना की पूरी ताकत सर्वोच्च धार्मिक नेता यानी कि अली खामेनेई के दफ्तर में ही केंद्रित हो गई.

उससे भी बड़ी बात है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई के पास रजा शाह पहलवी की तरह देश छोडकर भागने का कोई ऑप्शन भी नहीं है, क्योंकि अयातुल्लाह अली खामेनेई न सिर्फ ईरान की नुमांइदगी करते हैं बल्कि वो इस्लाम के एक बड़े वर्ग शिया के भी नुमाइंदे हैं. जिस रोहेल्ला खुमैनी की जगह अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई ने ली है, उन्होंने इस्लामिक क्रांति के जरिए ईरान की सत्ता हासिल की थी.

अगर अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई ईरान को इस बीच मंझधार में अपनी जान बचाने के लिए छोड़कर जाते हैं तो फिर पूरे इस्लामिक वर्ल्ड में एक अलग मैसेज जाएगा और शिया-सुन्नी के बीच बंटे इस्लामिक जगत में फिर से ये बात होने लगेगी कि शिया मुस्लिम का जो नेता खुद को इस्लाम का भी नेता बताता था, जो खुद को ईरान का रहबर-ए-इन्कलाब कहता था, वो जंग छोड़कर भाग गया है.

क्यों अमेरिकी धमकी के आगे नहीं झुक रहे खामेनेई?

उम्र के आखिरी पड़ाव में जब अयातुल्लाह अली हौसेनी खामेनेई 86 साल के हो चुके हैं तो वो अपने माथे पर ऐसा दाग चस्पा करना नहीं चाहते हैं. ऐसे में जंग की सूरत में भी अयातुल्लाह अली होसैनी खामेनेई इतिहास में दर्ज होने के लिए भागने की बजाय शहादत देना ही पसंद करेंगे और यही वो कह भी रहे हैं, भले ही वो इसकी वजह न बता रहे हों.

यही कारण है कि उम्र के इस पड़ाव पर आकर भी वो अमेरिकी धमकी के आगे नहीं झुक रहे हैं. वो कह रहे हैं कि ईरान जंग के लिए तैयार है और इस जंग में वो अपनी शहादत देने के लिए भी तैयार हैं, लेकिन इतनी बयानबाजी के बाद भी ट्रंप सीधे ईरान में दखल नहीं दे रहे हैं. वो इंतजार कर रहे हैं.

इस बात का इंतजार कि अगर खामेनेई खुद से चले गए या जंग में वो मारे भी गए तो उनकी जगह लेगा कौन. क्योंकि खामेनेई का आखिरी दिन ईरान के इस्लामिक गणराज्य होने का भी तो आखिरी दिन होगा और उसके बाद ईरान का क्या होगा, इसे तय किए बिना ट्रंप अभी खुद को ईरान से दूर ही रखने की कोशिश करेंगे.

हां चिंगारी भड़कती रहेगी. ट्रंप उस चिंगारी को हवा भी देते रहेंगे, लेकिन दूर से. क्योंकि उस चिंगारी से जो आग निकलेगी, उसमें जलने का भी खतरा है और ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति होने के साथ-साथ एक कारोबारी भी हैं, जो कभी खतरों से नहीं खेलते. 



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