लैंड फॉर जॉब्स घोटाला केस! लालू यादव की याचिका पर दिल्ली HC ने फैसला सुरक्षित रखा, CBI की जांच पर उठाए हैं सवाल


दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें उन्होंने कथित लैंड-फॉर-जॉब्स घोटाले में सीबीआई की तरफ से दर्ज केस को रद्द करने की मांग की है. लालू यादव ने अपनी याचिका में दलील दी है कि सीबीआई ने उनके खिलाफ बिना वैधानिक मंजूरी के प्रारंभिक जांच शुरू की जो कानून के खिलाफ है. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत किसी भी जांच से पहले अनुमति जरूरी थी.

लालू यादव की दलील का सीबीआई ने किया विरोध 

दिल्ली हाई कोर्ट में लालू यादव की दलील का सीबीआई ने कड़ा विरोध किया. सीबीआई की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने हाई कोर्ट में कहा कि लालू यादव के खिलाफ लगाए गए आरोप उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े नहीं हैं, इसलिए धारा 17A के तहत पूर्व इजाजत की कोई जरूरत नहीं थी. 

उन्होंने यह भी कहा कि याचिका तकनीकी रूप से भी गलत है क्योंकि लालू यादव ने पहले सेशन कोर्ट का रुख नहीं किया और सीधे हाई कोर्ट आ गए. सीबीआई ने यह भी दलील दी कि 2023 में निचली अदालत की तरफ से चार्जशीट पर संज्ञान लेने का आदेश पूरी तरह वैध है क्योंकि कोर्ट ने सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए फैसला लिया था. भले ही जांच के दौरान कोई पूर्व मंजूरी न ली गई हो.

रॉउज एवन्यू कोर्ट ने लालू यादव समेत अन्य के खिलाफ तय किए थे आरोप 

रॉउज एवन्यू कोर्ट ने लालू यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी और उनके बच्चों तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और मीसा भारती के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के आरोप तय किए थे. कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए रेलवे मंत्रालय को अपनी निजी जागीर की तरह इस्तेमाल किया.

सीबीआई ने मामले में जांच करते हुए दाखिल की थी चार्जशीट 

सीबीआई के मुताबिक, यह मामला 2004 से 2009 के बीच का है, जब रेल मंत्रालय में ग्रुप-डी की नौकरियों के बदले उम्मीदवारों या उनके परिजनों से जमीन ली गई. वह जमीन लालू यादव के परिवार या करीबियों के नाम कराई गई. लालू यादव ने यह भी कहा कि 2009 से 2014 के बीच सीबीआई ने जांच कर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी. इसके बावजूद 2021 में दोबारा जांच शुरू करना और 2022 में एफआईआर दर्ज करना कानून का दुरुपयोग है. अब इस पूरे मामले में हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार है.



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