अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग को 16 दिन बीत चुके हैं. युद्ध का असर इन देशों के साथ-साथ दुनिया के अन्य देशों पर भी पड़ रहा है. होर्मुज ऑफ स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही पर भी प्रभावित हुई है, इसे सुरक्षित करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगी देशों से यहां वॉरशिप भेजने की अपील की थी, लेकिन होर्मुज पर ट्रंप की इन उम्मीदों को झटका लगता हुआ नजर आ रहा है. कई देश ऐसा करने से साफ इनकार करते हुए नजर आ रहे हैं.
ब्रिटेन का क्या रुख?
सोमवार सुबह डाउनिंग स्ट्रीट से एक ब्रीफिंग के दौरान, कीर स्टारमर ने कहा कि ब्रिटेन होर्मुज ऑफ स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए सहयोगियों के साथ एक व्यवहार्य योजना पर काम कर रहा है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नाटो मिशन नहीं होगा.
जर्मनी ने किया इनकार
जर्मनी ने भी वॉरशिप भेजने से इनकार कर दिया है. रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मांगों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ‘यह हमारा युद्ध नहीं है, हमने इसे शुरू नहीं किया है.’
दक्षिण कोरिया ने नहीं लिया फैसला
दक्षिण कोरिया ने भी ट्रंप के अनुरोध पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है. रविवार (15 मार्च) को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि देश ‘इस मामले पर अमेरिका के साथ घनिष्ठ रूप से संवाद करेगा और सावधानीपूर्वक समीक्षा के बाद निर्णय लेगा.’
जापान भी नहीं तैयार
जापान भी मौजूदा हालात में किसी भी तरह का कोई सुरक्षा अभियान शुरू करता नहीं दिख रहा है. रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइज़ुमी ने सोमवार (16 मार्च) को संसद में स्पष्ट रूप से कहा, ‘ईरान की वर्तमान स्थिति में हम फिलहाल समुद्री सुरक्षा अभियान शुरू करने पर विचार नहीं कर रहे हैं.’
ऑस्ट्रेलिया ने भी किया इनकार
ऑस्ट्रेलिया ने भी होर्मुज ऑफ स्ट्रेट में वॉरशिप भेजने से मना कर दिया है. कैबिनेट सदस्य कैथरीन किंग ने भी सोमवार (16 मार्च) को सरकारी प्रसारक एबीसी को दिए एक इंटरव्यू में होर्मुज ऑफ स्ट्रेट में नौसैनिक जहाज भेजने से इनकार कर दिया.
चीन का रुख साफ नहीं
वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के एक प्रवक्ता ने यह नहीं बताया कि बीजिंग ट्रंप के अनुरोध को स्वीकार करेगा या नहीं, लेकिन कहा कि सभी पक्षों की जिम्मेदारी है कि वे स्थिर और निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करें.