अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 1 अप्रैल 2026 को नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी NATO छोड़ने की धमकी दी. इससे पहले भी वह कई बार धमकियां दे चुके हैं, लेकिन इस धमकी पर कोई अमल नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि NATO से निकलना अमेरिका के लिए सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस या ट्वीट नहीं, बल्कि, अमेरिका ग्लोबल पॉवर वाले देश की इमेज भी खो सकता है. आइए एक्सप्लेनर में समझते हैं कि अमेरिका NATO क्यों नहीं छोड़ सकता है?
सवाल 1: NATO की सदस्यता छोड़ने की प्रोसेस क्या है?
जवाब: 1949 में NATO का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के मलबे से उपजी एक कड़वी मजबूरी थी, जिसकी स्थापना मूल नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी से हुई. इसके आर्टिकल 13 में NATO से बाहर निकलने की प्रोसेस का भी जिक्र है. इसके लिए:
- 20 साल की शर्त: संधि 24 अगस्त 1949 को लागू हुई थी. इसलिए 1969 के बाद किसी भी सदस्य देश को बाहर निकलने का अधिकार मिल गया.
- नोटिस देना जरूरी: देश को सिर्फ एक साल पहले लिखित सूचना (notice of denunciation) अमेरिकी सरकार (Treaty Depositary) को देनी होती है.
- अमेरिका की भूमिका: अमेरिका इस सूचना को अन्य सभी सदस्य देशों को बताता है.
- एक साल बाद बाहर: नोटिस देने के ठीक एक साल बाद देश NATO से पूरी तरह अलग हो जाता है. कोई और मंजूरी या बहस की जरूरत नहीं.
यह अनुच्छेद बहुत आसान और स्पष्ट है. इसमें कोई जटिल शर्त या वीटो पावर नहीं है. बस एक साल का नोटिस काफी है.

सवाल 2: तो फिर अमेरिका भी आर्टिकल 13 के तहत NATO छोड़ सकता है?
जवाब: नहीं. अमेरिका का NATO छोड़ना इतना आसान नहीं है कि ट्रंप ने धमकी दी और बाहर हो गया. इसे खुद अमेरिका ने ही मुश्किल बनाया है. 2023-24 में अमेरिकी कांग्रेस ने नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट (NDAA) सेक्शन 1250A पास किया था. इस पर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने साइन किया था. इसमें लिखा है कि अमेरिका राष्ट्र्पति NATO से सस्पेंड, टर्मिनेट, डिनाउंस या निकल नहीं सकता. अमेरिका को NATO छोड़ने के लिए सीनेट से 2/3 बहुमत या कांग्रेस का अलग कानून चाहिए.
कोई फंड भी इस काम के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता. यह कानून खासतौर पर ट्रंप को रोकने के लिए बनाया गया था. कांग्रेशनल रिसर्च सर्विस (CRS) रिपोर्ट R48868 में लिखा है कि ये पहला कानून है जो किसी ट्रीटी से राष्ट्रपति को निकलने से रोकता है. अगर ट्रंप अकेले नोटिस दें तो कांस्टीट्यूशनल क्राइसिस हो जाएगा और सुप्रीम कोर्ट तक मामला जा सकता है. यानी ट्रंप के महज धमकियां देने से NATO से पीछा नहीं छूटेगा.

सवाल 3: क्या अमेरिका को NATO की जरूरत है? अगर नहीं तो क्यों?
जवाब: विदेश मामलों के जानकार और JNU के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं कि NATO सिर्फ यूरोप की सुरक्षा नहीं, बल्कि अमेरिका की ग्लोबल पावर प्रोजेक्शन का आधार है…
- अमेरिकी सैन्य बेस: अमेरिका के करीब 1 लाख सैनिक यूरोप में तैनात हैं. ये बेस बिना NATO के नहीं चल सकते. अगर अमेरिका NATO से निकल गया तो लॉजिस्टिक्स, रिफ्यूलिंग और ऑपरेशंस महंगे और मुश्किल हो जाएंगे.
- इंटेलिजेंस शेयरिंग: NATO का ग्लोबल नर्वस सिस्टम इंटेलिजेंस शेयरिंग है. लोकल इंटेलिजेंस से रूस, चीन, नॉर्थ कोरिया और ईरान जैसे देशों की खुफिया जानकारी मिलती है. अटलांटिक काउंसिल और बेलफेर सेंटर का कहना है कि अमेरिका यह अकेले नहीं कर सकता.
- आपसी तालमेल: NATO से अमेरिका F-35, म्यूनिशंस और फ्यूल समेत कई चीजें अन्य देशों से ऑपरेट होती हैं. बिना NATO के अमेरिका को अकेले लड़ना पड़ेगा.
फेयर ऑब्जर्वर की रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, बिना NATO के अमेरिका का यूरोप में पॉलिटिकल वेट घट जाएगा. NATO अमेरिका को यूरोपीय शक्ति बनाता है. अमेरिका रक्षा संसाधनों में NATO का हिस्सा सिर्फ 15% है, लेकिन स्ट्रेटजिक वैल्यू बहुत ज्यादा है.

सवाल 4: इसके बावजूद अमेरिका NATO से निकलने की कोशिश करेगा तो क्या होगा?
जवाब: कांग्रेस में दोनों पार्टियां (डेमोक्रेट और रिपब्लिकन) NATO को अमेरिकी सुरक्षा का आधार मानती हैं. निकासी का बिल सिनेट में पास होना लगभग नामुमकिन है. फिर भी अगर अमेरिका निकलने की कोशिश करता है तो सबसे पहले संवैधानिक संकट खड़ा होगा, फिर उसकी वैश्विक ताकत कमजोर होगी, NATO बचेगा लेकिन कमजोर हो जाएगा…
- अगर ट्रंप अनुच्छेद 13 के तहत सूचना दे देते हैं, तो यह कानून का सीधा उल्लंघन होगा. अमेरिकी कांग्रेस तुरंत विरोध करेगी, सुनवाई करेगी, फंड रोकने की कोशिश करेगी या महाभियोग की धमकी देगी.
- मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है. अदालत Youngstown फैसले (1952) के आधार पर फैसला देगी कि राष्ट्रपति कांग्रेस के कानून के खिलाफ नहीं जा सकता.
- अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पडे़गा. सैन्य ठिकानों, व्यापार और हथियार बिक्री प्रभावित होंगे. रैंड और विल्सन सेंटर की रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षा वादों के घटने से द्विपक्षीय व्यापार 450 अरब डॉलर तक गिर सकता है.
- अमेरिका पर वैश्विक विश्वसनीयता घटेगी. सहयोगी देश अमेरिका को ‘अविश्वसनीय साथी’ मानेंगे. ईरान युद्ध के बाद पहले से ही दरार बढ़ी है. इससे ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन टूट सकता है.
वहीं, NATO पर भी इसका असर पड़ेगा. NATO की संधि बाकी 31 देशों के बीच जारी रहेगी. यूरोप पहले ही रक्षा खर्च बढ़ा चुका है. अब यूरोपीय देश तेजी से अपना रक्षा ढांचा बनाएंगे, लेकिन न्यूक्लियर बचाव, कमांड स्ट्रक्चर और आधुनिक तकनीक में अमेरिका की कमी महसूस होगी.
सवाल 5: तो क्या ट्रंप के NATO छोड़ने के दावे खोखले हैं?
जवाब: राजन कुमार कहते हैं, ‘ट्रंप NATO से निकलने की धमकियां और कोशिशें जारी रखेंगे. वह फंडिंग में कमी कर सकते हैं और NATO के खिलाफ बयान दे सकते हैं, लेकिन पूरी तरह बाहर नहीं होंगे.’

NATO 4 अप्रैल 1949 को स्थापित एक अंतरसरकारी सैन्य गठबंधन है, जिसका मुख्यालय ब्रुसेल्स, बेल्जियम में है. यह एक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था है, जिसके तहत 32 सदस्य देशों में से किसी एक पर भी हमला सभी पर माना जाता है. इसका उद्देश्य राजनीतिक और सैन्य साधनों के माध्यम से सदस्य देशों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा करना है.