फ्रांस के बाद भारत भी ‘गोल्ड मिशन’ पर: विदेश से सोना वापस, अरबों का दांव- क्या बदल रही है वैश्विक आर्थिक ताकत?


फ्रांस ने चुपचाप ऐसा आर्थिक दांव खेला है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. अमेरिका में रखा अपना 129 टन सोना हटाकर फ्रांस ने न सिर्फ उसे पेरिस में जमा किया, बल्कि इस प्रक्रिया में अरबों का मुनाफा भी कमा लिया. यह कदम सिर्फ एक ट्रांसफर नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय रणनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है.

फ्रांस के केंद्रीय बैंक, Banque de France, ने जुलाई 2025 से जनवरी 2026 के बीच न्यूयॉर्क में रखे करीब 129 टन सोने को हटाने का फैसला लिया. यह उसके कुल गोल्ड रिजर्व का लगभग 5% हिस्सा था. लेकिन खास बात यह रही कि फ्रांस ने सोना सीधे ट्रांसफर नहीं किया. उसने अमेरिका में रखे पुराने और गैर-मानक गोल्ड बार्स को रिकॉर्ड ऊंची कीमत पर बेच दिया और उसी पैसे से यूरोप में नए, अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले गोल्ड बार्स खरीद लिए.

इस स्मार्ट रणनीति से फ्रांस को करीब 12.8 अरब यूरो (लगभग 15 अरब डॉलर) का भारी मुनाफा हुआ. अब स्थिति यह है कि फ्रांस का पूरा गोल्ड रिजर्व करीब 2,437 टन पेरिस में ही सुरक्षित रखा गया है, जिससे देश का अपने भंडार पर पूरा नियंत्रण हो गया है.

इस प्रक्रिया में फ्रांस ने सिर्फ सोना ट्रांसफर नहीं किया, बल्कि एक स्मार्ट रणनीति अपनाई. न्यूयॉर्क में रखे पुराने गोल्ड बार्स को रिकॉर्ड ऊंची कीमतों पर बेचकर, उसी पैसे से यूरोप में बेहतर और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सोना खरीदा गया. इस पूरे ऑपरेशन से करीब 14.76 अरब डॉलर का मुनाफा हुआ, जिससे फ्रांस के केंद्रीय बैंक की आय में बड़ा उछाल आया.

बैंक ने इसे “रिजर्व क्वालिटी अपग्रेड” बताया, लेकिन इस कदम ने इतिहास की यादें भी ताजा कर दीं. 1960 के दशक में Charles de Gaulle के नेतृत्व में फ्रांस ने ‘Vide-Gousset’ ऑपरेशन के तहत हजारों टन सोना अमेरिका और ब्रिटेन से वापस मंगाया था, जिसने Bretton Woods system पर दबाव बनाया.

क्या है बड़ा मैसेज?
फ्रांस का यह कदम सिर्फ मुनाफा कमाने की रणनीति नहीं, बल्कि एक गहरी आर्थिक सोच का हिस्सा माना जा रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, अपने गोल्ड रिजर्व को देश के भीतर लाने का फैसला “आर्थिक सुरक्षा” और “रणनीतिक स्वतंत्रता” को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है. अब फ्रांस ने अपने सोने पर विदेशी निर्भरता कम कर दी है और सीधे अपने नियंत्रण में रख लिया है, जिससे किसी भी वैश्विक संकट की स्थिति में तेजी से फैसले लिए जा सकेंगे.

दरअसल, सोना किसी भी देश के लिए सिर्फ एक धातु नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का मजबूत आधार होता है. ऐसे में उसका नियंत्रण अपने हाथ में होना बेहद अहम माना जाता है. रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि यह कदम 1960-70 के दशक की उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की याद दिलाता है, जब गोल्ड और अमेरिकी डॉलर के रिश्ते में बड़ा बदलाव आया था और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था नई दिशा में मुड़ गई थी.

इसी संदर्भ में फ्रांस की यह रणनीति संकेत देती है कि आने वाले समय में देश अपनी आर्थिक संप्रभुता को और मजबूत करने पर जोर दे सकते हैं.

भारत क्यों वापस ला रहा है अपना सोना?
यूरोप में फ्रांस की तरह ही भारत भी अपने गोल्ड रिजर्व को लेकर बड़ी रणनीतिक चाल चल रहा है. RBI ने पिछले कुछ समय में तेजी से विदेशों में रखे सोने को देश में वापस लाना शुरू किया है.

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2023 से अब तक RBI करीब 274 टन से ज्यादा सोना भारत ला चुका है. इसमें वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में ही लगभग 64 टन सोना शामिल है. अब भारत के कुल करीब 880.8 टन गोल्ड रिजर्व में से लगभग दो-तिहाई हिस्सा देश के भीतर ही रखा गया है, जबकि बाकी सोना अभी भी विदेशी तिजोरियों में सुरक्षित है.

इस कदम के पीछे सिर्फ भंडारण की सुविधा नहीं, बल्कि बड़े रणनीतिक कारण हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अनिश्चितता के बीच भारत अपने गोल्ड रिजर्व पर सीधा नियंत्रण मजबूत करना चाहता है. इससे आपात स्थिति में संसाधनों तक तुरंत पहुंच सुनिश्चित हो सकेगी.

इसके अलावा, घरेलू स्तर पर सोना रखने से उसकी liquidity भी बढ़ती है, यानी जरूरत पड़ने पर उसे तेजी से इस्तेमाल या मैनेज किया जा सकता है.

वैश्विक असर और ट्रेंड:
फ्रांस का यह कदम सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर उभरते एक बड़े ट्रेंड की ओर इशारा करता है. पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने अपने गोल्ड रिजर्व को विदेशी तिजोरियों से निकालकर वापस देश में लाने (गोल्ड रिपैट्रिएशन) की प्रक्रिया तेज की है. इसका मकसद साफ है, आर्थिक अनिश्चितता या भू-राजनीतिक तनाव के समय अपने संसाधनों पर सीधा नियंत्रण रखना.

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अस्थिरता, डॉलर पर निर्भरता और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में बदलाव ने देशों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि उनका सोना उनके अपने देश में ही सुरक्षित होना चाहिए. इसके साथ ही एक और अहम ट्रेंड उभरकर सामने आया है, ऊंची सोने की कीमतों का रणनीतिक इस्तेमाल. कई केंद्रीय बैंक पुराने या कम मानक वाले गोल्ड बार्स को बेचकर, उसी पैसे से नए और अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले गोल्ड खरीद रहे हैं. इससे न सिर्फ उनके रिजर्व की गुणवत्ता बेहतर हो रही है, बल्कि मूल्य भी बढ़ रहा है.

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