आप इसको आधिकारिक मानिए, अनाधिकारिक मानिए, लेकिन ये तय मानिए कि अमेरिका और ईरान के बीच जो सीजफायर हुआ था, वो अब टूट गया है. क्योंकि इस सीजफायर के होने के बाद भी न तो ईरान की एक भी शर्त मानी गई है और न ही अमेरिका की, लिहाजा इस सीजफायर का कोई मतलब नहीं रह गया है और इस बात की पूरी-पूरी आशंका है कि 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में जो दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मुलाकात होनी थी, वो अब कभी नहीं होगी.
अमेरिका और ईरान के बीच हुए सीजफायर की सबसे बड़ी शर्त थी होर्मुज का खुलना. और वो सीजफायर के ऐलान के बाद खुल ही गया था लेकिन अभी उससे कोई जहाज गुजरता उससे पहले ही इजरायल ने लेबनान पर भयंकर हमला कर दिया, जबकि ईरान की सीजफायर की ये भी शर्त थी कि लेबनान पर हमला नहीं होगा. जब इजरायल ने लेबनान पर हमला कर दिया तो फिर ईरान ने भी होर्मुज बंद कर दिया. और अब बात फिर वहीं जाकर अटक गई है, जहां से ये पूरी जंग शुरू हुई थी.
और इस बात के अटकने की असली वजह है इजरायल का रवैया. जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर का ऐलान हो गया और उसमें ईरान ने लेबनान पर हमले रोकने की बात कही जिसे अमेरिका ने मान लिया तो उसके कुछ ही देर के अंदर इजरायल ने लेबनान पर हमला कर दिया और दावा किया कि सीजफायर की शर्तों में लेबनान शामिल नहीं है. अमेरिका ने तुरंत तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन इजरायल को भी कोई चेतावनी नहीं दी गई, जिससे ईरान को यकीन हो गया कि लेबनान में इजरायल के हमले के पीछे अमेरिका की भी सहमति है. लिहाजा ईरान ने भी अपनी ओर से होर्मुज को फिर से बंद कर दिया. इसके बाद अमेरिकी धमकी भी फिर से शुरू हो गई.
ट्रंप से लेकर जेडी वेंस तक बोलने लगे कि अगर ईरान ने सीजफायर की शर्तें नहीं मानी तो अंजाम भयंकर होंगे. ट्रंप ने इजरायल का साथ देते हुए कह दिया कि सीजफायर की शर्तों में लेबनान शामिल नहीं है. इसपर ईरान कोई प्रतिक्रिया देता, उससे पहले ही इजरायल ने लेबनान में हमला करके एक दिन के अंदर-अंदर 250 से ज्यादा लोगों को मार दिया और दावा किया कि उसने हिजबुुल्लाह के नए मुखिया नईम कासिम को भी मार गिराया है. इसके बाद लेबनान में राष्ट्रीय शोक घोषित कर दिया गया. फिर तो ईरान का भी भड़कना स्वाभाविक था. ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने साफ तौर पर अमेरिका से कहा कि अब तय ट्रंप को करना है कि वह सीजफायर करना चाहते हैं या फिर इजरायल के जरिए जंग जारी रखना चाहते हैं.
यही वजह है कि अमेरिका और ईरान के बीच 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत पर भी ग्रहण लग गया है. ईरान के प्रतिनिधियों को 9 अप्रैल को ही इस्लामाबाद पहुंचना था. पाकिस्तान ने भी इसकी तैयारी कर ली थी और 10-11 अप्रैल को पूरे इस्लामाबाद में सरकारी छुट्टी घोषित कर दी गई थी. लेकिन अभी कुछ होता, इससे पहले ही इस्लामाबाद में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मोगदम ने अपनी वो सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट कर दी, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधियों की बातचीत की बात लिखी गई थी. इसने उस आशंका को और भी बल दे दिया है कि अब ये सीजफायर लागू नहीं रहेगा और जंग फिर से शुरू होगी. इससे पहले ईरान की ओर से अमेरिका से बातचीत करने आ रहे ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर गालिबफ ने भी लेबनान पर हमलों को देखते हुए कहा था कि ये बातचीत तो अतार्किक है.
अब अगर सीजफायर के बाद हुए सारे ऐक्शन को देखें तो जो एक बात सामने निकलकर आती है, वो सिर्फ इतनी सी है कि इस सीजफायर के टूटने की असली वजह वो इजरायल है, जो इस जंग को शुरू करने की भी वजह बना था. क्योंकि न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट कहती है कि बेंजामिन नेतन्याहू ने मोसाद के अधिकारियों के साथ मिलकर 11 फरवरी को ही ट्रंप के ओवल ऑफिस में एक प्रेजेंटेशन दी थी, जिसके बाद ट्रंप ईरान पर हमले को राजी हुए थे और उन्होंने अपने सहयोगी जेडी वेंस की बात को अनसुना करते हुए कहा था कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया जाए.
अब जंग के करीब 40 दिन बाद जब सीजफायर हुआ तब भी इजरायल ने ही लेबनान पर हमला करके ये सीजफायर तोड़ दिया. क्योंकि इजरायल को डर सिर्फ इस बात का था कि जो सीजफायर हुआ है या हो रहा है, वो ईरान की शर्तों पर हो रहा है और अगर ईरान की शर्तों को मानकर अमेरिका सीजफायर करता है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान इजरायल को ही उठाना पड़ेगा. क्योंकि अभी तक इजरायल खुद को मिडिल ईस्ट में सबसे बड़ी ताकत के तौर पर देखता आया है.
अरब मुल्कों के साथ उसने कई बार अकेले जंग की है और जीती है. सारे अरब देश मिलकर भी कभी इजरायल का कुछ बिगाड़ नहीं पाए थे. लेकिन अब अकेले ईरान ने न सिर्फ इजरायल बल्कि अमेरिका को भी छका दिया तो इजरायल की बादशाहत भी खतरे में पड़ गई. लिहाजा वो चाहता है कि जंग अंजाम तक पहुंचे. और इसके लिए जरूरत सीजफायर की नहीं बल्कि जंग की है. क्योंकि अगर जंग रुकी और ईरान की शर्तों पर रुकी तो फिर खतरा इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व पर भी है. क्योंकि वो इजरायल के इतिहास में वो पहले प्रधानमंत्री बन जाएंगे, जो ईरान के आगे झुका हुआ दिखेगा और तब वो शायद ही अपनी कुर्सी पर बने रह पाएंगे. सीजफायर को तोड़कर पूरी दुनिया को जंग में धकलने का जो खेल है, वो खेल इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का है, जो बिना इस खेल के अपनी कुर्सी बचा नहीं पाएंगे.
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