जहां ईरान वॉर से हिल गई पूरी दुनिया, IMF ने इंडियन इकोनॉमी पर दी गुड न्यूज, कहा- भारत के डिफेंस सेक्टर ने…


अमेरिका-इजरायल और ईरान जंग की वजह से पूरी दुनिया अस्त-व्यस्त है, एनर्जी सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत की इकोनॉमी को लेकर बेहद महत्वपूर्ण बात कही है. आईएमएफ ने कहा है कि घरेलू डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग देश की आर्थिक बढ़ोतरी को मजबूत कर सकता है.  मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसी पहलों से भारत की विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम हुई है और इसकी वजह से आने वाले समय में भारत को आर्थिक बढ़ोतरी मिलेगी. 

आईएमएफ ने बताया कि जब सैन्य खर्च स्थानीय उद्योगों को समर्थन देता है, तो इससे उत्पादन में बढ़ोतरी हो सकती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है. आईएमएफ ने वैश्विक रक्षा रुझानों को लेकर अपने ताजा विश्लेषण में कहा कि रक्षा क्षेत्र में बढ़ोतरी से कम समय में ही आर्थिक गतिविधियों को गति मिल सकती है, जिससे उपभोग और निवेश दोनों में वृद्धि देखने को मिल सकती है.

यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच दुनियाभर में रक्षा खर्च बढ़ रहा है. हाल के सालों में लगभग आधे देशों ने रक्षा बजट बढ़ाया है, जिससे कोल्ड वॉर के बाद आई गिरावट पलट गई है. भारत के लिए आईएमएफ के नतीजे साफ तौर पर आर्थिक बढ़त की ओर इशारा करते हैं. जब डिफेंस खर्च इंपोर्ट के बजाय घरेलू प्रोडक्शन पर आधारित होता है तो फायदा और ज्यादा होता है.

आईएमएफ ने कहा कि रक्षा खर्च मल्टीप्लायर औसतन 1 के करीब है. इसका मतलब है कि खर्च में हर बढ़ोतरी मोटे तौर पर इकोनॉमिक आउटपुट में भी वैसी ही बढ़ोतरी में बदलती है. हालांकि, इसका असर अलग-अलग देशों में बहुत अलग-अलग होता है. आईएमएफ के अनुसार, ‘जो देश हथियारों के इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, उनमें रक्षा खर्च मल्टीप्लायर छोटे होते हैं, जो विदेशों में डिमांड में कमी को दिखाता है.’

यह अंतर भारत के पक्ष में है. भारत ने विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करने और घरेलू रक्षा बेस बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं. खर्च का एक बड़ा हिस्सा अब लोकल मैन्युफैक्चरिंग, प्राइवेट फर्मों और जॉइंट वेंचर्स की ओर जाता है. आईएमएफ ने कहा कि इंपोर्ट पर ज्यादा खर्च बाहरी संतुलन को कमजोर कर सकता है. रिपोर्ट में कहा गया, ‘बाहरी संतुलन तब बिगड़ते हैं जब डिमांड इंपोर्टेड इक्विपमेंट की ओर बढ़ जाती है.’

स्वदेशीकरण पर भारत का जोर ऐसे दबावों को कम करने में सहायक हो सकता है. इससे मांग का बड़ा हिस्सा देश की अर्थव्यवस्था के भीतर ही बना रहता है, जो रोजगार सृजन और निवेश को बढ़ावा देने में मदद करता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि डिफेंस खर्च एक टारगेटेड डिमांड शॉक की तरह काम करता है. यह सरकारी कंजम्प्शन बढ़ाता है और प्राइवेट खर्च को बढ़ा सकता है, खासकर डिफेंस से जुड़े सेक्टर में. समय के साथ, यह प्रोडक्टिविटी को भी सपोर्ट कर सकता है. 

आईएमएफ ने कहा, ‘एक बिल्डअप जो सार्वजनिक निवेश को प्राथमिकता बनाता है, लंबे समय तक प्रोडक्टिविटी ग्रोथ का समर्थन कर सकता है.’ हालांकि, आईएमएफ ने खर्च बहुत तेजी से बढ़ने पर रिस्क को भी बताया. आईएमएफ ने कहा कि फिस्कल डेफिसिट जीडीपी के लगभग 2.6 फीसदी तक बढ़ जाता है और पब्लिक कर्ज तीन साल के अंदर लगभग 7 फीसदी बढ़ जाता है.

ये दबाव संघर्ष के दौरान और भी ज्यादा होते हैं, जब कर्ज तेजी से बढ़ता है और सामाजिक खर्च कम हो सकता है. 2010 के दशक के बीच से दुनियाभर में रक्षा खर्च बढ़ रहा है. अब लगभग 40 फीसदी देश अपनी जीडीपी का 2 फीसदी से ज्यादा रक्षा पर खर्च करते हैं. नाटो सदस्यों ने 2035 तक रक्षा और सुरक्षा से जुड़े खर्च को जीडीपी के 5 फीसदी तक बढ़ाने का वादा किया है, जो सैन्य खर्च में लगातार बढ़ोतरी की ओर इशारा करता है.

भारत अपनी डीजीपी का लगभग 2 फीसदी रक्षा पर खर्च करता है. इसने हाल के सालों में नीति में सुधारों और इंसेंटिव के जरिए घरेलू प्रोडक्शन बढ़ाया है. आईएमएफ के विश्लेषण से पता चलता है कि जिन देशों की लोकल डिफेंस इंडस्ट्री मजबूत हैं, वे ज्यादा मिलिट्री खर्च को ग्रोथ में बदलने और बाहरी जोखिमों को कम करने के लिए बेहतर स्थिति में हैं. 

 

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