‘विश्वगुरु की हग्लोमेसी फेल!’ पाकिस्तान में US-ईरान शांति वार्ता को लेकर कांग्रेस का केंद्र सरकार पर हमला


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  • चीन के सामने भारत के आत्मसमर्पण पर उठाए सवाल।

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध में शांति स्थापित करने की पहल के तहत आज शनिवार (11 अप्रैल, 2026) को पाकिस्तान की मेजबानी में राजधानी इस्लामाबाद में शांति वार्ता होनी है. इस्लामाबाद में होने वाली इस वार्ता को लेकर कांग्रेस पार्टी ने भारत सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं और प्रधानमंत्री की हग्लोमेसी की निंदा की है. इसके साथ ही कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार वाशिंगटन को US-ईरान के बीच मध्यस्थता में इस्लामाबाद को महत्वपूर्ण भूमिका सौंपने से रोकने में विफल रही है.

भारत सरकार की नीति पर कांग्रेस का कटाक्ष

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने शनिवार (11 अप्रैल, 2026) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट शेयर कर लिखा, ‘अमेरिका और ईरान के बीच आज इस्लामाबाद में बैठक शुरू हो रही है. भारत समेत पूरी दुनिया को उम्मीद है कि यह दोनों देशों के बीच एक स्थायी शांति प्रक्रिया की शुरुआत होगी, जो इजरायल की ओर से अपने पड़ोस में जारी आक्रामकता से पटरी से नहीं उतरेगी.’

इस दौरान उन्होंने भारत सरकार की विदेश नीति के नजरिए पर सवाल उठाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हग्लोमेसी की निंदा भी की. उन्होंने लिखा, ‘लेकिन इससे खुद को विश्वगुरु घोषित करने वाले व्यक्ति की हग्लोमेसी के स्टाइल पर भी गंभीर सवाल उठते हैं.’

कांग्रेस ने पूछे कौन से चार महत्वपूर्ण सवाल?

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इस दौरान भारत सरकार से चार महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए.

  • पहला सवालः कांग्रेस ने पूछा कि अप्रैल, 2025 में पहलगाम आतंकी हमले में अपनी भूमिका और हमलों के बाद भारत की ओर से पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिए किए गए राजनीतिक कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान ने अपने लिए एक नई भूमिका कैसे बना ली है? यह विफलता विशेष रूप से इसलिए निंदनीय है कि क्योंकि डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने नवंबर 2008 के आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान को बहुत प्रभावी तरह से अलग-थलग कर दिया था.
  • दूसरा सवालः भारत ने अमेरिका को पाकिस्तान को यह नई भूमिका सौंपने की अनुमति कैसे दे दी, जबकि मोदी और उनके समर्थकों ने नमस्ते ट्रंप, हाउडी मोदी और फिर एक बार ट्रंप सरकार जैसे नारे लगाए थे? भारत ने एक स्पष्ट रूप से एकतरफा ट्रेड डील पर भी सहमति जताई, जिसमें उसने अपनी अपेक्षा से कहीं ज्यादा दिया, फिर भी मोदी सरकार US के साथ कोई डील करने में विफल रही.
  • तीसरा सवालः भारत ने ब्रिक्स+ के वर्तमान अध्यक्ष के तौर पर शांति या मध्यस्थता की कोई पहल क्यों शुरू नहीं की, खासकर तब जब ईरान UAE और सऊदी अरब ब्रिक्स+ के सदस्य हैं?
  • चौथा सवालः कांग्रेस ने सवाल उठाया कि पिछले 18 महीनों में चीन के सामने भारत के सुनियोजित सरेंडर से क्या फायदा हासिल हुआ है. विशेष तौर पर ऑपरेशन सिंदूर के प्रति पाकिस्तान की प्रतिक्रिया में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका और उसे लगातार समर्थन देने के मद्देनजर?

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