तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की सूट-बूट वाली तस्वीर ने इन दिनों सियासत में भूचाल ला दिया है. एक सरकारी कार्यक्रम में विजय जब सूट-बूट में नजर आए तो DMK और AIADMK समेत कई दलों ने उन पर तीखे हमले शुरू कर दिए. विपक्ष का कहना था कि तमिल संस्कृति और द्रविड़ आंदोलन की पहचान रहे पारंपरिक लिबास को छोड़कर एक तमिल मुख्यमंत्री का पूरे विदेशी अंदाज में आना जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है. सवाल सिर्फ एक सूट का नहीं है, यह पूरी बहस हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि भारत में नेताओं की पोशाक कभी भी मामूली कपड़ा नहीं रही, बल्कि विचारधारा, क्षेत्रीय अस्मिता और सियासत की पहचान रही है. आइए समझते हैं कि भारतीय नेताओं की पहचान कुर्ता-पायजामा से कैसे बनी, वे कुछ और क्यों नहीं पहनते और नेहरू जैकेट का किस्सा इसमें कहां से आ जुड़ता है…
विजय का सूट और बवाल की वजह- सिर्फ कपड़ा नहीं, सियासी टूल
तमिलनाडु की राजनीति में कपड़े हमेशा एक गहरा संदेश देते हैं. पेरियार से लेकर अन्नादुरै, करुणानिधि, MGR और जयललिता तक, लगभग हर बड़ा नेता सफेद वेष्टी-शर्ट या फिर साड़ी में नजर आया, जो सादगी और तमिल गौरव का प्रतीक बन गया. द्रविड़ आंदोलन ने शुरू से ही उत्तर भारतीय ब्राह्मणवादी छवि के खिलाफ मोर्चा खोला और इसमें पहनावा भी एक बड़ा हथियार था. ऐसे में जब मुख्यमंत्री विजय, जो खुद को आम तमिल का प्रतिनिधि बताते हैं, एक सरकारी कार्यक्रम में फुल सूट पहनकर पहुंचे तो विपक्षी दलों को मानो मुद्दा हाथ लग गया.
DMK नेताओं ने इसे ‘दिल्ली की गुलामी’ तक कह डाला, जबकि अन्नाद्रमुक ने सवाल उठाया कि क्या विजय को तमिल परंपरा से शर्म आती है. सोशल मीडिया पर भी यह बहस छिड़ गई कि आखिर भारतीय नेता कोट-पैंट से इतनी दूरी क्यों बनाए रखते हैं और कुर्ता-पायजामा उनकी मजबूरी है या रणनीति?
गांधी-नेहरू से शुरू हुआ खेल- आजादी के आंदोलन ने बुन दी वर्दी
इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए हमें करीब 105 साल (1921) पीछे जाना होगा, जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था. तब तक कांग्रेस के बड़े नेता भी कोट-पतलून और टाई लगाकर अंग्रेजों से बहस करते थे. महात्मा गांधी ने इस तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया. जब वे विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी की बात करने लगे, तो उन्होंने खुद मिल में बुनी खादी की धोती और साधारण कुरता अपनाया. यह सिर्फ एक पोशाक नहीं थी, यह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आम भारतीय से जुड़ने का सबसे मजबूत संदेश थी. 1925 में ‘यंग इंडिया’ में लिखते हुए गांधी जी ने साफ शब्दों में कहा था, ‘खादी मेरे लिए स्वराज की सांस है. जो आदमी खादी नहीं पहनता, वह भारत की गरीबी को नहीं समझ सकता.’
इसके ठीक बाद आते हैं जवाहरलाल नेहरू. उन्होंने देसी और विदेशी का एक नायाब मिक्स तैयार किया. वे चुस्त चूड़ीदार पायजामे के साथ लंबा अचकन या बंद गले का कोट पहनते थे, जिसे दुनिया ने ‘नेहरू जैकेट’ का नाम दिया. उनके सीने पर लाल गुलाब और सिर पर गांधी टोपी ने ऐसी छवि खड़ी की कि आधुनिक भारत का एक स्टाइलिश लेकिन नॉन-वेस्टर्न नेता उभरकर सामने आया. यह जैकेट इस बात का सबूत थी कि हम पश्चिम से सीख सकते हैं लेकिन गुलामी नहीं करेंगे. धीरे-धीरे कुर्ता-पायजामा और नेहरू जैकेट हर उस नेता की पहली पसंद बन गए, जो जनता के बीच जाना चाहता था और खुद को अंग्रेजों या बाद में बड़े उद्योगपतियों से अलग दिखाना चाहता था.
नेताओं की ड्रेसिंग सेंस सिर्फ कुर्ता-पायजामा ही क्यों?
अब असल सवाल यह है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी हमारे नेता कोट-पतलून या जींस-टीशर्ट में क्यों नहीं दिखते, जबकि देश का हर दूसरा नागरिक यह सब पहनता है? इसके पीछे कई ठोस वजहें हैं.
- पहली वजह: कुर्ता-पायजामा अब एक राजनीतिक ‘यूनिफॉर्म’ बन चुका है जो किसी भी नेता को तुरंत स्थानीय और जमीनी दिखाता है. सूट पहनकर निकलने वाला नेता ‘एलीट’ यानी कुलीन वर्ग से जुड़ा माना जाता है, जबकि ढीला-ढाला खादी का कुर्ता पहनने वाला नेता अपने आप आम आदमी की तरह दिखता है.
- दूसरी वजह: हमारे देश की गर्मी और उमस में सूट-टाई पहनकर जनसभा करना किसी सजा से कम नहीं है, जबकि सूती कुर्ता हवादार और आरामदायक रहता है.
- तीसरी वजह: पंजाब का नेता हो या बंगाल का, सबके कुर्ते की कटाई और साथ में पहने जाने वाले स्टोल या शॉल में फर्क होता है, जो उसकी स्थानीय जड़ों को दिखाता है. तमिलनाडु में तो सफेद वेष्टी और शर्ट इतनी मजबूत सियासी पहचान है कि वहां किसी नेता का सूट पहनना अपने वोटरों को खुद से दूर करने जैसा हो सकता है, ठीक वैसा ही जैसा विजय के मामले में होता दिख रहा है.
असल में, हर नेता की अलमारी एक रणनीति के तहत तय होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके सबसे अच्छे मौजूदा उदाहरण हैं. वे देश में तो हमेशा हाफ स्लीव या फुल स्लीव कुर्ता और चूड़ीदार पहनते हैं, ऊपर से स्टाइलिश सदरी जैकेट डाल लेते हैं, लेकिन विदेश दौरे पर कभी-कभी बंदगला सूट भी पहन लेते हैं. दोनों ही परिधानों से वे अपनी छवि को साधते हैं यानी अंदर देसी और बाहर वैश्विक.
ठीक इसी तरह कांग्रेस के राहुल गांधी सफेद कुर्ता-पायजामा और कभी-कभी जींस-टीशर्ट में भी दिख जाते हैं, जो नौजवानों को जोड़ने का प्रयास है. लेकिन सूट का इस्तेमाल चुनिंदा मौकों पर ही होता है, जैसे संसद में शपथ ग्रहण या किसी बहुत ऊंचे राजनयिक डिनर में. अगर कोई नेता लगातार सूट में घूमने लगे तो जनता उसे अपने बीच का नहीं मानती.
तो क्या बदल रहे हैं वक्त के साथ कपड़े?
विजय की इस कंट्रोवर्सी के बाद एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है कि क्या भारतीय नेताओं को अपनी पोशाक की सियासी कंडीशनिंग से बाहर निकलना चाहिए. कुछ युवा विधायक आजकल जींस-शर्ट और जैकेट में दिखने लगे हैं, जो बताता है कि बदलाव की बयार चल रही है. लेकिन द्रविड़ पार्टियों की तीखी प्रतिक्रिया यह भी साफ करती है कि कपड़ों का राजनीति से रिश्ता जल्दी टूटने वाला नहीं है.
तमिलनाडु जैसे राज्य में तो वेष्टी का प्रतीकात्मक महत्व इतना गहरा है कि सूट पहनने को आसानी से भुलाया नहीं जाएगा. हो सकता है, विजय अपनी अगली जनसभा में फिर से वेष्टी-शर्ट में ही नजर आएं, ताकि यह संदेश जाए कि उन्होंने जनता की भावना को समझा है.
कुल मिलाकर, कुर्ता-पायजामा और नेहरू जैकेट की यह यात्रा गांधी की खादी से शुरू होकर नेहरू के आधुनिक भारत के सपने और फिर हर राज्य की क्षेत्रीय अस्मिता तक पहुंची है. यह इस बात का सबूत है कि हमारे यहां नेता सिर्फ अपने भाषणों से नहीं, बल्कि अपने पहनावे से भी बहुत कुछ कह जाता है. विजय के सूट का बवाल इसी पुरानी लेकिन मजबूत हो चुकी परंपरा का ताजा अध्याय है.