ईरान पर जमकर पैसा लुटाएंगे ट्रंप, 300 अरब डॉलर की करेंगे बारिश! तेहरान की शर्तों के आगे झुके?


US Iran Peace Deal: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर नई जानकारी सामने आई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक इस डील की कीमत कम से कम 300 अरब डॉलर हो सकती है. ईरानी मीडिया का दावा है कि तेहरान ने युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई, प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में फंसी अपनी संपत्तियों तक पहुंच की मांग की है. बदले में ईरान क्षेत्र में जारी तनाव को खत्म करने और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हुआ है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि ईरान के साथ समझौता पूरा हो चुका है. ट्रंप ने इसे एक बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है. उनका कहना है कि इससे ऊर्जा बाजार स्थिर होंगे और होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा पूरी तरह खुल सकेगा. हालांकि समझौते के सामने आ रहे विवरण अमेरिका के लिए कई नए सवाल भी खड़े कर रहे हैं. अमेरिका जहां इस पैकेज को निवेश और पुनर्निर्माण कार्यक्रम बता रहा है, वहीं ईरान इसे युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के रूप में पेश कर रहा है.

19 जून को स्विट्जरलैंड में हो सकते हैं हस्ताक्षर

प्रारंभिक समझौता ज्ञापन पर 19 जून को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर होने की संभावना है. हालांकि दस्तावेज अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है और सामने आ रही कई जानकारियों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. फिर भी 300 अरब डॉलर के पैकेज ने इस समझौते को केवल युद्धविराम से कहीं बड़ा मुद्दा बना दिया है. अब यह ईरान की राजनीतिक ताकत, आर्थिक दबाव और अमेरिका की रणनीतिक स्थिति से जुड़ा विषय बन गया है.

ईरान की बड़ी मांग- 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण पैकेज

ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी मेहर न्यूज के अनुसार, ईरान की वार्ता टीम ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से कम से कम 300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण कार्यक्रम की मांग की है. इसके अलावा ईरान ने 60 दिन की बातचीत अवधि के दौरान विदेशों में फंसी 24 अरब डॉलर की ईरानी संपत्तियां जारी करने की मांग की है, जिसमें आधी राशि अग्रिम देने की बात कही गई है. साथ ही तेल, पेट्रोकेमिकल उत्पादों और उनसे जुड़े कारोबार पर लगे प्रतिबंध हटाने तथा ईरान को अपने वित्तीय संसाधनों तक पूरी पहुंच देने की मांग भी शामिल है.

ईरान बोला- यह मुआवजा है, अमेरिका बोला- निवेश योजना

ईरानी मीडिया इस पैकेज को युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा बता रहा है. ईरान लंबे समय से युद्ध क्षति की भरपाई की मांग करता रहा है. कुछ अनुमानों में यह नुकसान एक ट्रिलियन डॉलर तक बताया गया है. ईरान का कहना है कि आर्थिक राहत के बिना कोई भी शांति समझौता लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा. वहीं अमेरिकी अधिकारियों और पश्चिमी मीडिया, खासकर न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्टों में इस 300 अरब डॉलर को अंतरराष्ट्रीय निवेश कोष और पुनर्निर्माण कार्यक्रम के रूप में पेश किया गया है.

विटकॉफ और कुशनर की योजना भी चर्चा में

रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जारेड कुशनर ने पहले तेहरान में रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स और निवेश कोष बनाने जैसे सुझाव दिए थे. विश्लेषकों का कहना है कि यह मॉडल ट्रंप की उस पुरानी सोच से मेल खाता है जिसमें वे युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण को सरकारी मुआवजे के बजाय निजी निवेश और बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट्स के जरिए आगे बढ़ाना चाहते हैं.

क्या अमेरिका कमजोर स्थिति में बातचीत कर रहा है?

ईरान खुद को मजबूत स्थिति में दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका युद्ध को समाप्त कर इसे कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करना चाहता है. फरवरी में शुरू हुआ संघर्ष अमेरिका और इज़रायल के लिए आर्थिक और राजनीतिक चुनौती बन गया. तेल आपूर्ति प्रभावित होने से वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी असर पड़ा. विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध के बाद इतने बड़े निवेश पैकेज की चर्चा यह संकेत देती है कि अमेरिका को जमीनी हकीकतों के अनुसार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है.

ट्रंप के लिए राजनीतिक चुनौती भी बना युद्ध

ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, “सभी को बधाई, तेल को बहने दो.” उन्होंने इस समझौते को वैश्विक स्थिरता और ऊर्जा बाजार के लिए बड़ी सफलता बताया. लेकिन अमेरिका में कई लोग इसे अलग नजरिए से देख रहे हैं. नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले युद्ध और उसके आर्थिक प्रभाव ट्रंप के लिए राजनीतिक सिरदर्द बन गए हैं.

समझौते की सच्चाई पर अभी भी सवाल

लंदन स्थित ईरान इंटरनेशनल नेटवर्क ने कहा है कि समझौते का मसौदा अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है. अमेरिकी अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से 300 अरब डॉलर वाले दावे की पुष्टि नहीं की है. वॉशिंगटन पहले कुछ लीक हुई जानकारियों को मनगढ़ंत या भ्रामक भी बता चुका है.

ईरान और इजरायल दोनों में विरोध

ईरान के कट्टरपंथी गुट इस समझौते को लेकर चिंतित हैं और संभावित रियायतों पर सवाल उठा रहे हैं. उधर इजरायल भी समझौते के कुछ हिस्सों से असहमत बताया जा रहा है, खासकर लेबनान और हिज़्बुल्लाह से जुड़े मुद्दों को लेकर.

लेबनान बन सकता है पहला बड़ा परीक्षण

पूर्व अमेरिकी राजनयिक और मध्य पूर्व विशेषज्ञ आरोन डेविड मिलर का मानना है कि लेबनान इस समझौते की पहली बड़ी परीक्षा बन सकता है. उनका कहना है कि लेबनान में मौजूद प्रॉक्सी संघर्ष किसी भी समय युद्धविराम को कमजोर कर सकते हैं.

ईरान की राजनीति पर निर्भर करेगा भविष्य

अमेरिका के पूर्व सहायक विदेश मंत्री इलियट अब्राम्स का कहना है कि इस समझौते का असली भविष्य ईरान की आंतरिक राजनीति पर निर्भर करेगा. उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान की जनता अपने देश के भविष्य को किस दिशा में ले जाती है.



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