‘गवाहों के बयान के बाद केस टालना गलत, रोज हो संवेदनशील मामलों की सुनवाई’ : सुप्रीम कोर्ट



सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विशेष रूप से संवेदनशील मामलों में, दिन-प्रतिदिन सुनवाई की प्रथा पूरी तरह से समाप्त कर दी गयी है और अदालतों को इसे दोबारा अपनाना चाहिए. कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 में अंतर्निहित मानते हुए कहा कि सभी हाई कोर्ट को संबंधित जिला कोर्ट के लाभ के लिए इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा करने के लिए एक समिति गठित करनी चाहिए.

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि दिन-प्रतिदिन के आधार पर सुनवाई करने की पुरानी प्रथा पर लौटने के लिए, पुलिस के कामकाज के तरीके सहित वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य को समझना आवश्यक है.

तीस साल पुरानी प्रथा पूरी तरह समाप्त

पीठ ने 22 सितंबर के अपने आदेश में कहा, ‘विशेष तौर पर महत्वपूर्ण या संवेदनशील मामलों में दिन-प्रतिदिन सुनवाई करने की लगभग तीस साल पुरानी प्रथा पूरी तरह समाप्त कर दी गयी है. हमारा मानना ​​है कि अब समय आ गया है कि कोर्ट इस प्रथा को फिर से अपनाएं.’

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश CBI की उस याचिका पर आया है, जिसमें पिछले साल सितंबर में बलात्कार के एक मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट की ओर से एक आरोपी को जमानत देने के आदेश को चुनौती दी गई थी. पीठ ने कहा कि न्याय प्रणाली में देरी के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारकों में से एक है आपराधिक मुकदमों की निरंतर सुनवाई न करना.

गवाहों के बयान के बाद दिन-प्रतिदिन सुनवाई जारी

पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में भी कोर्ट विवेकाधिकार का इस्तेमाल करके साक्ष्यों पर ‘टुकड़ों में’ विचार करती हैं और मामले प्रभावी रूप से कई महीनों या वर्षों तक चलते रहते हैं. पीठ ने कहा कि कानूनी स्थिति यह है कि एक बार गवाहों के बयान के बाद संबंधित कोर्ट को दिन-प्रतिदिन सुनवाई जारी रखनी चाहिए, जब तक कि सभी गवाहों के बयान न हो जाए, सिवाय उन गवाहों के जिन्हें सरकारी वकील ने छोड़ दिया हो.

पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने प्रशासनिक पक्ष को संबंधित जिला न्यायपालिकाओं को एक परिपत्र जारी करने का निर्देश दे सकते हैं, जिसमें अन्य बातों के अलावा इस बात का भी जिक्र किया गया हो कि प्रत्येक जांच या सुनवाई शीघ्रता से की जानी चाहिए. पीठ ने कहा कि मामले की सुनवाई 31 दिसंबर तक पूरी की जाए.

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