NATO का ये मेंबर देश रूस से खरीद रहा जरूरत का 80 परसेंट तेल, बस भारत को ही सारी हेकड़ी दिखा रहे ट्रंप



रूस-यूक्रेन युद्ध को तीन साल हो चुके हैं. इस दौरान नाटो (NATO) देशों ने रूस से ऊर्जा आयात रोकने का संकल्प लिया था, लेकिन विडंबना यह है कि नाटो का सदस्य हंगरी आज भी अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल रूस से खरीद रहा है. वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए निशाना साध रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि जब नाटो का सहयोगी ही रूस पर इतना निर्भर है, तो ट्रंप की नाराजगी का बड़ा हिस्सा भारत की तरफ क्यों है?

हंगरी की रूस पर निर्भरता
हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान ने साफ कहा है कि उनका देश रूसी ऊर्जा लेना जारी रखेगा. उनका तर्क है कि अगर तेल-गैस की आपूर्ति बंद हुई तो हंगरी की अर्थव्यवस्था घुटनों पर आ जाएगी और तुरंत 4% गिरावट आएगी. युद्ध शुरू होने से पहले हंगरी की रूस पर निर्भरता 61% थी, जो अब बढ़कर 86% हो गई है.

भारत पर ट्रंप का दबाव
ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल और हथियार खरीदने को लेकर कड़े कदम उठाए. भारतीय सामान पर 50% तक टैरिफ लगाए गए, जिनमें 25% शुल्क सीधे रूस से जुड़े सौदों पर था. भारत ने इसे ‘अनुचित’ कहा और दोहराया कि वह अपने 1.4 अरब नागरिकों के लिए जहां सस्ता और सुरक्षित सौदा मिलेगा, वहीं से तेल खरीदेगा. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि ‘ऊर्जा सुरक्षा की बलि राजनीतिक दबाव पर नहीं चढ़ाई जा सकती.’

ट्रंप की नाराजगी और नाटो पर सवाल
ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा कि चीन और भारत रूसी तेल खरीदकर युद्ध को फंड कर रहे हैं, लेकिन ‘नाटो देश भी अगर रूसी ऊर्जा नहीं रोकते तो यह आत्मघाती है.’ उन्होंने चेतावनी दी कि रूस पर बड़े प्रतिबंध तभी लगाए जाएंगे जब ‘सभी नाटो देश तेल खरीदना बंद करेंगे.’

विकल्प होने के बावजूद हंगरी का इंकार
हंगरी का कहना है कि उसके पास रूसी पाइपलाइन के अलावा विकल्प नहीं हैं, लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि क्रोएशिया की एड्रिया पाइपलाइन और यूरोप के कई एलएनजी टर्मिनल विकल्प हो सकते हैं. रिपोर्टों के अनुसार, हंगरी और स्लोवाकिया ने युद्ध शुरू होने के बाद से रूस को कच्चे तेल पर लगभग 6 अरब डॉलर का टैक्स चुकाया है.

स्लोवाकिया लचीला, हंगरी अड़ा
स्लोवाकिया ने संकेत दिया है कि वह विकल्प तलाश सकता है और अमेरिका से भी बातचीत कर रहा है. लेकिन हंगरी ने जून 2025 में रूस के साथ दीर्घकालीन अनुबंध खत्म होने के बाद भी खरीद जारी रखी.

नाटो की मुश्किल
हंगरी घरेलू राजनीति में इसे अपना बचाव बना रहा है. चुनाव से पहले प्रधानमंत्री ऑर्बान खुद को ‘ब्रुसेल्स और वॉशिंगटन के दबाव’ के खिलाफ जनता के हितों का रक्षक बता रहे हैं. लेकिन हकीकत यह है कि नाटो का एक सदस्य खुद रूस की सबसे बड़ी ऊर्जा लाइफलाइन बनाए हुए है, जबकि भारत पर सबसे ज्यादा अमेरिकी दबाव डाला जा रहा है. 



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