अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने भारतीयों को दिवाली की शुभकामनाएं दी. इसी संदेश के साथ सालेह ने भारतीय सरकार को एक खतरे से भी आगाह किया और चेतावनी दी. पूर्व राष्ट्रपति ने यह खतरा उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित एक मदरसे में बताया.
अमरुल्लाह सालेह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर शुभकामना संदेश के साथ चेतावनी देते हुए पोस्ट में लिखा, ‘सभी भारतीयों और दुनिया भर के हिंदुओं को दिवाली की शुभकामनाएं! आप सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं. इस बीच कृपया देवबंद मदरसे का नजर बनाए रखें.’
अफगानिस्तान के विदेश मंत्री ने किया था दौरा
अब उनके इस संदेश को 11 अक्टूबर के अफगानिस्तानी विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की के भारत दौरे से जोड़कर देखा जा रहा है. दरअसल अपनी भारत यात्रा के दौरान मुतक्की ने उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम देवबंद मदरसे का भी दौरा किया था. अफगान विदेश मंत्री का कहना था कि देवबंद मदरसे से तालिबान का पुराना नाता है.
देवबंद दौरे के दौरान अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुतक्की ने दारुल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी, जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी और अन्य वरिष्ठ उलेमा से मुलाकात की थी. दारुल उलूम देवबंद के वाइस चांसलर ने पगड़ी पहनाकर अफगानिस्तान के विदेश मंत्री को सम्मानित किया था.
देवबंद से क्या है तालिबान का नाता?
तालिबान में दारुल उलूम देवबंद मदरसे की काफी अहमियत मानी जाती है, क्योंकि तालिबान के नेताओं ने दारुल उलूम हक्कानिया मदरसे से शिक्षा ली है, जो पाकिस्तान में स्थित है. हक्कानिया मदरसा की स्थापना मौलाना अब्दुल हक ने की थी, जिन्होंने दारुल उलूम देवबंद से भी पढ़ाई की थी. उनके बेटे मौलाना समी उल हक को तालिबान का संरक्षक माना जाता है. देवबंद का नाम सिर्फ एक मदरसे के लिए नहीं, बल्कि एक विचारधारा के जन्मस्थान के रूप में भी जाना जाता है.
1866 में अंग्रेजों के शासन के दौरान स्थापित दारुल उलूम, देवबंद का उद्देश्य इस्लामी शिक्षा को बाहरी प्रभावों से सुरक्षित रखना और कुरान-हदीस को उनके असली स्वरूप में पढ़ाना था. यहीं से देवबंदी आंदोलन की शुरुआत हुई, जो धीरे-धीरे भारत से निकलकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तक फैल गई. इस तरह देवबंद विश्वस्तरीय इस्लामी शिक्षा केंद्र के रूप में उभरा.
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