Afghanistan In SCO: SCO में भारत के दो दोस्त करेंगे पाकिस्तान की नाक में दम, टेंशन में शहबाज, इंडिया को फायदा


भारत के दो मित्र देशों के एक कदम से पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं. रूस में अफगानिस्तान की इस्लामिक अमीरात के राजदूत गुल हसन ने कहा है कि अफगानिस्तान शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के साथ अपना सहयोग दोबारा शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार है. अफगानिस्तान फिलहाल SCO में एक पर्यवेक्षक देश है, लेकिन अब वह संगठन की बैठकों में फिर से सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है.

रूसी समाचार एजेंसी TASS को दिए इंटरव्यू में गुल हसन ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अफगान प्रतिनिधि आने वाली SCO बैठकों में हिस्सा लेंगे. उन्होंने बताया कि रूस और चीन के प्रयासों के बाद SCO के अधिकतर सदस्य देशों इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अफगानिस्तान की भागीदारी को फिर से शुरू करना जरूरी और व्यावहारिक है.

पाकिस्तान के लिए मुश्किल

अफगानिस्तान की यह सक्रियता पाकिस्तान के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है. अगर तालिबान सरकार SCO मंच पर सक्रिय होती है तो पाकिस्तान और अफगानिस्तान एक ही मंच पर बराबरी के स्तर पर बैठेंगे. यह बात इस्लामाबाद के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है.

अफगानिस्तान के होने से पाकिस्तान को नुकसान

गुल हसन ने कहा कि अफगानिस्तान क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, ड्रग्स की तस्करी रोकने और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर SCO के साथ मिलकर काम करना चाहता है. उनका मानना है कि अफगानिस्तान को अलग-थलग रखने के बजाय क्षेत्रीय ढांचे का हिस्सा बनाना पूरे इलाके के हित में है. अगर अफगानिस्तान SCO में सक्रिय होता है तो पाकिस्तान का प्रभाव कमजोर हो सकता है. अब तक पाकिस्तान खुद को अफगान मामलों में अहम खिलाड़ी बताता रहा है, लेकिन SCO जैसे मंच पर अफगानिस्तान की सीधी मौजूदगी से यह स्थिति बदल सकती है. इससे भारत को भी फायदा होगा, क्योंकि भारत पहले से SCO का सदस्य है और उसके अफगानिस्तान के साथ पुराने और मजबूत रिश्ते रहे हैं.

चीन का अफगानिस्तान को मदद

इसके अलावा, चीन भी अफगानिस्तान के साथ सीधे आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है. इससे पाकिस्तान पर निर्भरता कम हो सकती है. अगर SCO अफगानिस्तान को लेकर कोई साझा नीति अपनाता है, तो पाकिस्तान को भी उसी के अनुसार चलना पड़ेगा. SCO में चीन, रूस, भारत, पाकिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के कई देश शामिल हैं. ऐसे में अफगानिस्तान की वापसी उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला सकती है और क्षेत्रीय राजनीति में उसकी स्थिति मजबूत कर सकती है.

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