26 जुलाई 1956… मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने एलेक्जेंड्रिया में एक लंबा भाषण दिया. उन्होंने फ्रांसीसी इंजीनियर फर्डिनांड डे लेस्सेप्स का नाम लिया और सुएज कैनाल पर कब्जे का ऐलान कर दिया. मिस्र के हजारों सैनिकों ने कंपनी के दफ्तरों पर कब्जा कर लिया. नासिर ने कहा कि कैनाल का मुनाफा अब मिस्र का है. इसकी वजह अमेरिका और ब्रिटेन का वादे से पलटना थी, जिसमें मिस्र का डैम बनाने की बात हुई थी. सुएज बंद होने से दुनियाभर में तेल संकट गहरा गया. वैसा ही कुछ अब 70 साल बाद हो रहा है. इसमें भी अमेरिका-इजरायल तो शामिल हैं ही, लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस भी हैं. कैसे 70 साल बाद इतिहास खुद को दोहरा रहा है, एक्सप्लेनर में समझते हैं…
सवाल 1: होर्मुज स्ट्रेट की आज ब्लॉकेड स्थिति क्या है?
जवाब: ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह बंद कर दिया है. यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया का 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है. ईरान का कहना है कि जब तक इजरायल और अमेरिकी हमले नहीं रुकेंगे, तब तक यह ब्लॉकेड नहीं हटेगा. नतीजा यह है कि हजारों जहाज फंस गए हैं, शिपिंग कंपनियां ट्रैफिक रोक रही हैं, तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और वैश्विक व्यापार बुरी तरह ठप हो गया है. यह ठीक 1956 के सूएज (Suez) संकट जैसा है, जब एक छोटे जलमार्ग के बंद होने से एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापार की लाइफलाइन कट गई थी.

सवाल 2: 1956 का सूएज संकट आखिर क्या था और यह कैसे शुरू हुआ?
जवाब: 26 जुलाई 1956… मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने सूएज कैनाल कंपनी को नेशनलाइज कर लिया. यह कंपनी ब्रिटेन और फ्रांस की थी और कैनाल मिस्र की जमीन पर था. नासिर ने कहा कि अब कैनाल से जो टोल टैक्स आएगा, वह मिस्र के असवान डैम प्रोजेक्ट में लगेगा, जो नील नदी के बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए बनाया जा रहा था. ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल को यह बर्दाश्त नहीं हुआ.
29 अक्टूबर 1956 को इजरायल ने सिनाई पर हमला बोल दिया. फिर ब्रिटेन और फ्रांस ने ‘कैनाल बचाने’ के नाम पर सैनिक उतार दिए. असल मकसद नासिर को हटाना और कैनाल पर कब्जा करना था. कैनाल के पास तेल टैंकों में आग लग गई, धुआं आसमान छूने लगा और दुनिया भर के अखबारों में महीनों तक फ्रंट पेज हेडलाइंस छाए रहे.

सवाल 3: 1956 में सुएज संकट कैसे खत्म हुआ?
जवाब: 2 नवंबर 1956 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने फ्रंट पेज पर छापा ‘ब्रिटेन पैरलाइजेस सूएज शिपिंग’. ब्रिटेन की संसद में हंगामा मच गया, विपक्षी लेबर पार्टी के सांसदों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री एंथनी ईडन से इस्तीफा मांगा. यूनाइटेड नेशंस (UN) सिक्योरिटी काउंसिल में 7-2 वोट से रेजोल्यूशन पास हुआ. अमेरिका ने ब्रिटेन पर आर्थिक दबाव डाला और सोवियत यूनियन (अब रूस) ने सख्त चेतावनी दी. नवंबर 1956 में सीजफायर हो गया.
UN ने दुनिया की पहली पीसकीपिंग फोर्स भेजी. दिसंबर 1956 के अंत तक ब्रिटेन और फ्रांस के सैनिक मिस्र से निकल गए. इजरायल ने मार्च 1957 तक गाजा में अपने सैनिक रखे, फिर UN के दबाव में हट गया. कैनाल अप्रैल 1957 में फिर खुल गया. पहला ब्रिटिश जहाज 19 अप्रैल 1957 को मिस्र को टोल देकर गुजरा. फ्रांस ने कुछ समय boycott जारी रखा, लेकिन आखिरकार महंगे शिपिंग खर्च की वजह से मान गया.

सवाल 4: सुएज संकट और होर्मुज संकट एक जैसे क्यों हैं?
जवाब: दोनों संकटों में एक छोटा जलमार्ग बंद होने से वैश्विक व्यापार की रीढ़ टूट गई. 1956 में सूएज कैनाल पांच महीने से ज्यादा बंद रहा था. ठीक इसी तरह 2026 में होर्मुज ब्लॉकेड ने हजारों जहाज फंसा दिए हैं, लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि 1956 में अमेरिका और सोवियत यूनियन ने ब्रिटेन-फ्रांस-इजरायल के खिलाफ खड़े होकर UN सिक्योरिटी काउंसिल में रेजोल्यूशन पास करवाया था.
70 साल बाद ईरान ने अमेरिका और रूस के साथ मिलकर UN सिक्योरिटी काउंसिल में ठीक वैसा ही रेजोल्यूशन मांगा है. यानी इजरायल और अमेरिका के ईरान में हमले रोकने के लिए इमरजेंसी जनरल असेंबली बुलाई जाए. आज ईरान और रूस एक साथ खड़े हैं, जबकि 1956 में अमेरिका पुराने यूरोपीय साम्राज्यवाद का साथ नहीं दे रहा था.
1956 में भारत ने पूरे दिल से UN रेजोल्यूशन का समर्थन किया था. तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने UN महासचिव डैग हम्मारस्कोल्ड को चिट्ठी लिखकर कहा था, ‘यह स्पष्ट और स्वीकार किया गया है कि इजरायल ने मिस्र के खिलाफ बड़े पैमाने पर हमले किए हैं. इस संकट को रोकने के बजाय ब्रिटेन और फ्रांस खुद मिस्र की जमीन पर हमले कर रहे हैं.’

हालांकि, आज भारत बैलेंस्ड रुख रखे हुए है. होर्मुज बंद होने से भारत का तेल आयात प्रभावित हो रहा है, क्योंकि हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक हैं. लंबा संकट चला तो पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, रुपया कमजोर पड़ सकता है और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन आज भारत शांति और कूटनीति का पक्ष ले रहा है.
सवाल 5: तो क्या होर्मुज भी सुएज की तरह जल्द खुल जाएगा?
जवाब: फॉरेन एक्सपर्ट और NEHU के प्रोफेसर प्रसेनजीत बिस्वास का मानना है कि 1956 में UN की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी ताकत थी. रेजोल्यूशन पास होने के बाद पीसकीपिंग फोर्स तुरंत भेजी गई, लेकिन 2026 के वसंत में UN की स्थिति अलग है. अब वीटो पावर वाले देश ज्यादा सक्रिय हैं और निर्णय लेना जटिल हो गया है. 1956 की तुलना में 2026 में UN की प्रभावशीलता कम दिख रही है. फिर भी दोनों संकट साबित करते हैं कि छोटे-छोटे जलमार्ग यानी होर्मुज, सूएज और बाब अल मंदब आज भी दुनिया की सबसे बड़ी कमजोरी हैं. अगर ये चोकपॉइंट्स एक साथ प्रभावित हुए तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप हो सकती है. भारत जैसे देशों को अब वैकल्पिक रूट, रणनीति और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीरता से सोचना होगा.
प्रसेनजीत बिस्वास कहते हैं, ‘होर्मुज ब्लॉकेड 1956 के सूएज संकट की याद इसलिए दिला रहा है क्योंकि दोनों ने साबित किया कि एक छोटा जलमार्ग बंद करने से पूरी दुनिया की किस्मत बदल सकती है. 1956 में पुराना यूरोपीय साम्राज्यवाद हारा. 2026 में नई शक्तियां किस दिशा में जा रही हैं, यह अगले कुछ हफ्तों में तय होगा.’