दो हफ्तों में ही अमेरिका और इजरायल को शायद ये बात बखूबी समझ में आ गई होगी कि उन्होंने ईरान की ताकत को कमतर आंकने की ऐसी गलती कर दी है, जिसका खामियाजा न सिर्फ अमेरिका और इजरायल को भुगतना पड़ रहा है, बल्कि अब पूरी दुनिया इस बेमतलब की जंग से बुरी तरह से प्रभावित है, लेकिन सवाल है कि ट्रंप से ये गलती हुई कैसे. पहले वियतनाम फिर अफगानिस्तान और उसके बाद इराक में लंबी-लंबी जंग में फंसने वाले अमेरिकी सैनिकों को ईरान की असली ताकत का पता आखिर क्यों नहीं चल पाया. सबसे जरूरी सवाल कि जो ट्रंप पूरी दुनिया पर अपनी बादशाहत चाहते हैं, उनके कौन से ऐसे सलाहकार थे, जिन्होंने ट्रंप को हमले का सुझाव देते वक्त ईरान की ताकत को कम बताया था और वो संभावित नुकसान का कोई आंकलन नहीं कर पाए थे. आखिर ईरान पर हमला करते वक्त ट्रंप ने क्यों नहीं याद किया वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान का अंजाम, आज बात करेंगे विस्तार से.
अगर इतिहास के जरूरी सबक याद न रखे जाएं तो वर्तमान ठीक वैसा ही हो जाता है, जैसा अभी अमेरिका के साथ हो रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न तो वियतनाम का सबक याद रखा, न इराक का और न ही अफगानिस्तान का, नतीजा ये है कि अब ट्रंप ईरान पर हमला करके फंस गए हैं. इतिहास में हुए इन तीनों ही अमेरिकी हमलों में अमेरिका और उसकी फौज का अंदाजा यही था कि जंग कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक की होगी और फिर ऑल इज वेल हो जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और 8 साल से लेकर 20-22 साल तक अमेरिकी फौजें इन देशों में फंसी रहीं, अपने साथियों की लाशें उठाती रहीं और अमेरिकी खजाना खाली होता रहा. ये एक जरूरी सबक था, जिसे अमेरिका के हर राष्ट्रपति को याद रखना जरूरी था. लेकिन ट्रंप तो ट्रंप हैं, उन्हें कहां कोई सबक याद रहता है. तो वो भूल गए कि इतिहास में अमेरिका के साथ क्या हुआ था. हां, वेनेजुएला उन्हें याद रहा, जहां चंद घंटों में ही उन्होंने राष्ट्रपति मादुरो को बंधक बनाकर वेनेजुएला पर कब्जा कर लिया और अपना आदमी राष्ट्रपति की कुर्सी पर बिठा दिया.
इस ऑपरेशन की सफलता से उत्साहित अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और उनके सलाहकारों ने ईरान पर भी हमला कर दिया. अमेरिका को तब ये एहसास था कि इजरायल की सीधी मदद और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मदद से ईरान में सत्ता परिवर्तन भी उतना ही आसान होगा, जितना वेनेजुएला में था. लेकिन ट्रंप और उनके सलाहकारों से यही गलती हो गई और भयंकर गलती हो गई.
क्योंकि ट्रंप के सलाहकारों को ये लगता था कि ईरान के पास जो हथियार हैं, वो इतने भी घातक नहीं हैं जिसका दावा ईरान की ओर से किया जाता रहा है. ऐसे में अमेरिका और इजरायल के एक साथ हमले के कुछ ही घंटों के अंदर ईरान के हथियार बेकार हो जाएंगे और अली खमेनेई के मारे जाने के बाद तो ईरान घुटने ही टेक देगा. हालांकि ऐसा हुआ नहीं. ईरान ने न केवल अपनी जवाबी हमला करने की क्षमता बनाए रखी, बल्कि अमेरिकी युद्धपोतों और क्षेत्रीय ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार कर दी. ये हमले इतने घातक थे कि अमेरिका और इजरायल का डिफेंस सिस्टम भी काम नहीं कर पाया और जब तक डिफेंस सिस्टम के सायरन बजते, ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें हमला कर देतीं.
ये तो सिर्फ लड़ाई की बात थी. इसके ऑफ्टर इफेक्ट के बारे में भी ट्रंप और उनके सलाहकार गलत साबित हुए. ट्रंप के सलाहकारों को शुरुआती तौर पर यही लगा था कि अगर ईरान पर हमला होता है तो तेल की सप्लाई प्रभावित होगी. कुछ दिनों के लिए तेल महंगा होगा और फिर तेल की कीमतें नीचे गिर जाएंगी. सब कुछ फिर से ऑल इज वेल हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. ईरान ने न सिर्फ होर्मुज स्ट्रेट को बंद किया बल्कि उसपर ऐसा कब्जा किया कि तेल की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं, गैस की सप्लाई प्रभावित होने लगी है और पूरी दुनिया में अब सवाल सिर्फ ट्रंप से ही पूछा जा रहा है कि आखिर ये जंग कब खत्म होगी.
लिहाजा ट्रंप प्रशासन में अब मातम का माहौल है. उनके सलाहकार अब दबी जुबान से इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि उनसे ईरान की क्षमता को आंकने में गलती हो गई है. अमेरिका के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने तो इतना तक कह दिया है कि ईरान ने जैसे पलटवार किया है, पेंटागन को उसकी कतई उम्मीद नहीं थी, लिहाजा अमेरिका की ऐसी कोई तैयारी भी नहीं है कि ईरान के इस तरह के जवाबी हमले का अमेरिका क्या जवाब दे. ऐसे में सवाल अब अमेरिका के भीतर से ही उठने लगे हैं. इसकी वजह से भले ही ट्रंप सार्वजनिक तौर पर या फिर अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर इस जंग में अमेरिका को जीतता हुआ बता रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर ट्रंप इस जंग से बाहर निकलने का रास्ता भी तलाश करने लगे हैं. बाकी तो अमेरीकी हमले के दौरान जिस तरह से दक्षिणी ईरान के मिनाब में एक लड़कियों के स्कूल पर घातक मिसाइलें गिरीं और उसमें ईरानी छात्राएं मारी गईं, उसने ट्रंप के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी माहौल बनाना शुरू कर दिया है. भले ही इस स्कूल पर हुए हमले को ट्रंप ईरान का हमला बता रहे हैं, लेकिन वहां मलबे से निकली टॉमहॉक’ मिसाइल के अवशेषों ने ट्रंप के झूठ की पोल खोल दी है और अब ट्रंप बैकफुट पर हैं.
लेकिन ट्रंप ने या कहिए कि अमेरिका ने ईरान को समझने में कोई पहली बार गलती नहीं की है, बल्कि ट्रंप हमेशा से ईरान को कमजोर समझने की गलती करते रहे हैं. इसकी शुरुआत हुई थी साल 2018 में, जब अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु करार तोड़ दिया था. तब ट्रंप को लगता था कि अगर अमेरिका ईरान के साथ परमाणु समझौते में रहा तो ईरान भले ही परमाणु हथियार न बना पाए, लेकिन समझौते की कमजोरी की वजह से ईरान न सिर्फ बैलिस्टिक मिसाइलें बना लेगा, बल्कि वो यमन के हूतियों, लेबनान के हेजबोल्लाह और इराकी मिलिशिया के जरिए और भी ताकतवर हो जाएगा. तब ट्रंप ने समझौते तोड़ते हुए ईरान पर और भी आर्थिक प्रतिबंध लगाए ताकि आर्थिक तौर पर तबाह होने के बाद ईरान घुटनों पर आएगा और फिर अमेरिका ईरान के साथ जो समझौता करेगा वो अमेरिकी शर्तों पर होगा.
लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उल्टे परमाणु करार से बाहर आने के बाद ईरान को परमाणु हथियार बनाने का मौका मिल गया. समझौते से हटने के ठीक बाद ईरान ने अपनी यूरेनियम संवर्धन प्रक्रिया को फिर से तेज कर दिया और नतीजा ये है कि ईरान अब कभी भी परमाणु हथियार बना सकता है. रही बात आर्थिक प्रतिबंधों की तो अमेरिकी प्रतिबंध का भी तोड़ ईरान ने खोज लिया था और उसी वक्त में ईरान ने चीन और रूस के रूप में ऐसे तगड़े दोस्त बना लिए थे, जिसकी कोई काट अमेरिका के पास थी ही नहीं.
अपने पहले कार्यकाल में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद अयातुल्लाह अली खमेनेई के नेतृत्व में ईरान ने हेजबोल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया के साथ अपने संबंध और भी मजबूत कर लिए. इसे देखते हुए अमेरिका ने ईरान को तोड़ने की एक और कोशिश की थी. और ये कोशिश हुई थी जनवरी 2020 में जब अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान का जनरल कासिम सुलेमानी मारा गया लेकिन उसके बाद भी ईरान ने घुटने नहीं टेके. जून 2025 में जब पहले इजरायल और फिर अमेरिका ने ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया तो ईरान को झटका तो लगा, लेकिन उसने तब भी घुटने नहीं टेके. फिर भी ट्रंप और उनके सलाहकारों को ईरानी ताकत समझ में नहीं आई, नतीजा ये है कि अपने पहले कार्यकाल के अधूरे मकसद को दूसरे कार्यकाल में हमला कर पूरा करने की कोशिश में जुटे ट्रंप फिर से फंस गए हैं.
और ट्रंप को फंसाने वाले कोई गैर नहीं बल्कि उनके अपने हैं. अगर ट्रंप के सलाहकारों की लिस्ट देखें तो उसमें दो तरह के सलाहकार नजर आते हैं. पहले वो हैं, जिनकी ट्रंप सबसे ज्यादा सुनते हैं और इस बार भी सुनी है, क्योंकि वही लोग हैं, जो हमेशा से ही ईरान के साथ जंग चाहते थे. उदाहरण के तौर पर ट्रंप को हमले के लिए उकसाने वालों में पहला नाम जॉन बोल्टन का है, जो अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके हैं. उन्हें ईरान का कट्टर दुश्मन माना जाता है. जब ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में ईरान के साथ परमाणु समझौता तोड़ा था तो उसके लिए उकसाने वाले यही जॉन बोल्टन थे जो तब न सिर्फ परमाणु समझौता तोड़ना चाहते थे बल्कि ईरान पर हमला भी करना चाहते थे. हालांकि तब ट्रंप ने जॉन बोल्टन की आधी बात ही सुनी थी और सिर्फ समझौता तोड़ा था.
ट्रंप के खास सलाहकारों में दूसरा नाम पूर्व विदेश मंत्री और सीआईए के डायरेक्टर माइक पोम्पिओ का है, जिनका हमेशा से मानना रहा है कि ईरान से कोई बात नहीं बल्कि सिर्फ जंग होनी चाहिए. कासिम सुलेमानी पर ड्रोन अटैक का प्लान हो या फिर जून 2025 में ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमले का प्लान, इसके लिए माइक पोम्पिओ को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है. बाकी तो अभी ट्रंप के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ हैं हीं, जिन्होंने न सिर्फ ट्रंप को हमले के लिए राजी किया बल्कि ईरान में फंसने के बाद भी वो कह रहे हैं कि अमेरिका जीत रहा है और उन्हीं की बात को ट्रंप सोशल मीडिया साइट ट्रूथ सोशल पर दोहरा भी रहे हैं. और अभी ट्रंप के जो विदेश मंत्री हैं मार्को रुबियो, ट्रंप उनकी भी खूब बात सुनते हैं. तो ईरान पर हमले के लिए पीछे मार्को रुबियो की सलाह न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. क्योंकि मार्को रुबियो भी ईरान को हमेशा अमेरिका के लिए एक खतरे के तौर पर ही देखते आए हैं. और उनका हमेशा से मानना रहा है कि ईरान से बात नहीं जंग होनी चाहिए. बाकी तो ट्रंप के एक सलाहकार और हैं, जिनपर ईरान के मामले में ट्रंप सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं. और वो हैं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, जिनके साथ के बिना ट्रंप ने न तो अब हमला किया है और न ही पिछला हमला किया था. ये नेतन्याहू की ओर से दी गई इंटेलिजेंस का ही नतीजा था कि ट्रंप ने ईरान पर सीधा हमला कर दिया, क्योंकि नेतन्याहू ट्रंप को समझाने में कामयाब रहे थे कि ईरान अब कभी भी परामाणु बम बना सकता है.
अगर ट्रंप ने अपने इन सलाहकारों की बात नहीं मानी होती और अपने सलाहकारों के दूसरे गुट की बात सुनी होती तो शायद परिस्थितियां कुछ अलग होतीं. क्योंकि ट्रंप के सलाहकारों के दूसरे गुट में जेडी वेंस और स्टीव विटकॉफ जैसे लोग हैं, जो जंग से ज्यादा बातचीत को असरदार मानते हैं. रही बात खुद ट्रंप की, तो वो भी तो चुनाव प्रचार के दौरान अमेरिका को हमेशा जंग से बचाने की ही वकालत करते रहे हैं. साल 2016 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने बतौर राष्ट्रपति उम्मीदवार अपना चुनाव प्रचार शुरू किया था, तो उन्होंने खुद को अमेरिका के ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर पेश किया था, जो अमेरिका को दुनिया भर की लड़ाइयों से बाहर रखेगा. तब उन्होंने अपनी ही पार्टी रिपब्लिकन और उसके नेताओं को इराक युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहराया था और कहा था कि ये अमेरिका की सबसे बड़ी गलती है.
तब ट्रंप कहा करते थे कि इराक पर हमला करके अमेरिका ने मध्य पूर्व एशिया को न सिर्फ अस्थिर किया है, बल्कि जंग में अमेरिका के खरबों डॉलर और हजारों सैनिकों की जान भी गई है, जिसका कोई नतीजा नहीं निकला. तब ट्रंप साफ तौर पर कहते थे कि अमेरिका को दुनिया का पुलिसकर्मी बनना बंद कर देना चाहिए. उस वक्त उन्होंने लिबिया में गद्दाफी को हटाने या फिर सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की भी मुखालफत की थी. और तब अमेरिकियों को भी लगा था कि शायद ट्रंप का इकलौता मकसद अमेरिका फर्स्ट ही है, तो ट्रंप वो चुनाव जीत गए थे. फिर 2024 में भी चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने वही वादे किए, जो उन्होंने 2016 में किए थे. तब उन्होंने खुद को शांति के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया था और कहा था कि मैं जंग शुरू नहीं करने जा रहा, बल्कि मैं जंग खत्म करने जा रहा हूं. उस दौरान उन्होंने ये भी कहा था कि अगर जो बाइडेन की जगह अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप होते तो रूस और यूक्रेन के बीच कोई जंग नहीं होती. उन्होंने हमास और इजरायल की जंग को भी रोकने की बात की थी.
लेकिन वो ट्रंप ही क्या, जो अपनी बात से पलट न जाएं. अपने पहले कार्यकाल में भी ट्रंप पलटे थे लेकिन उतना नहीं जितना दूसरे कार्यकाल में. पहले कार्यकाल में ट्रंप ने कोई बड़ी जंग नहीं लड़ी और वो सीरिया पर थोड़े मिसाइल हमले और ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या तक ही महदूद रहे. लेकिन दूसरे कार्यकाल में तो ट्रंप ने किसी जंग को रोकने की बजाय खुद ही जंग छेड़ दी. पहले जून 2025 में इजरायल की मदद से ईरान पर हमला कर उसके परमाणु संयंत्रों को बर्बाद किया फिर अमेरिकी सेना भेजकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को घर से ही उठवा लिया और अब फिर से फरवरी महीने के आखिरी दिन इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी लॉन्च कर दिया. लेकिन इस ऑपरेशन की तैयारी के दौरान ट्रंप का सारा कैलकुलेशन ऐसा गलत साबित हुआ है कि वो भी अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की तरह इराक और अफगानिस्तान वाले हालात में फंस गए हैं. अंतर सिर्फ इतना है कि इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना जमीन पर जंग लड़ते हुए फंसी थी और ट्रंप अभी तक अपनी सेना को ईरान में उतारने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं.
लिहाजा खुद को घिरा हुआ देखकर वो जंग को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं. वो कह रहे हैं कि अब ईरान के पास ऐसा कुछ बचा ही नहीं है कि उसपर हमला किया जाए. और ऐसा कहके ट्रंप शायद सिर्फ अपने दिल को या फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार को तसल्ली भर दे रहे हैं, क्योंकि अगर कोई ट्रंप से सवाल पूछे कि ईरान के पास अब ऐसा क्या नहीं है कि वो जंग लड़ सके तो ट्रंप इसका जवाब नहीं दे पाएंगे. क्योंकि दो हफ्ते की जंग में दो लाख करोड़ डॉलर और 8-10 अमेरिकी सैनिकों को गंवाने के बाद भी ट्रंप का हासिल सिर्फ अयातुल्लाह अली खमेनेई का खात्मा भर है, जिसे ईरान ने मुज्तबा खामेनेई के रूप में फिर से स्थापित कर दिया है. तो कुल जमा बात ये है कि ट्रंप को हासिल अभी कुछ भी नहीं है, जबकि वो कह रहे हैं ईरान के पास ही कुछ नहीं है. और ईरान कह रहा है कि अब ये जंग कब खत्म होगी, वो ईरान तय करेगा. जंग के खात्मे के लिए ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशेकियान ने तीन शर्तें रखीं हैं. और अगर ट्रंप उन शर्तों को मानते हैं तो फिर ट्रंप के लिए ये और भी बदनामी की बात होगी. अपनी जिद के लिए मशहूर ट्रंप शायद ही ईरान की शर्तें मानेंगे. और अगर ऐसा नहीं होगा तो जंग अभी और लंबी चलेगी.