Mughal Emperor Humanyu: ‘अब मुझे मक्का भेज दो’, जब हुमांयू ने चाकू से फुडवा दीं भाई की आंखें, दर्द से कराहते हुए कामरान ने की ये गुजारिश


मुगल बादशाह औरंगजेब और उसके भाई दारा शिकोह की कहानी तो सबको मालूम है कि औरंगजेब की क्रूरता से उसका भाई भी नहीं बच पाया था. औरंगजेब ने गद्दी के लिए अपने भाई का बहुत बुरा हश्र किया था. ऐसी ही कहानी है मुगल बादशाह बाबर के बेटे और हुमांयू के भाई कामरान की. हुमांयू और कामरान के बीच भी कई जंगें हुईं.

‘बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तां’ किताब के अनुसार यह बात तब की है जब हुमांयू हिंदुस्तान पर कब्जा करना चाहता था, लेकिन भाई कामरान अपनी सेना के साथ उसको परेशान कर रहा था. हुमांयू चाहता था कि कामरान हिंदुस्तान को जीतने में उसका साथ दे, लेकिन कामरान भाई के साथ जंग करने को उतारू था और इसका नतीजा ये हुआ कि हुमांयू ने कामरान की आंखें निकलवाकर उसको मक्का भेज दिया.

साल 1550 में हुमांयू ने काबुल दुर्ग पर कब्जा कर लिया औरकामरान ने अफगान कबिलों के पास शरण ले ली. कामरान ने अफगानों की सेना तैयार कर ली और हुमांयू को परेशान करने लगा. हुमांयू ने 1551 में कामरान के विरुद्ध सैन्य अभियान किया, जिसमें कामरान परास्त होकर भाग गया, लेकिन हुमांयू का एक भाई मिर्जा हिंदाल को अफगानों ने मार दिया. हुमांयू ने बहुत कोशिश की, लेकिन कामरान मुगलों की आपसी कलह को खत्म नहीं होने दे रहा था. भाई मिर्जा हिंदाल की हत्या पर हुमांयू की बहन गुलबदन बेगम ने लिखा है कि इसके बाद कामरान के जीवन में दुर्भाग्य का अंधेरा छा गया.

दोनों के बीच चाक की लड़ाई हुई, जिसमें हुमांयू चकमा देकर जीवत निकल गया, लेकिन कामरान ने अफगानों की मदद से काबुल दुर्ग पर कब्जा कर लिया और हुमांयू के पूरे परिवार को बंधी बना लिया. हुमांयू के बेटे अकबर को भी उसने बंदी बना लिया. तीन महीने बाद हुमांयू ने काबुल का रुख किया, कामरान ने हुमांयू को संदेशा भिजवाया कि अगर हुमांयू कांधार जाकर रहे और काबुल उसके पास ही रहने दे तो वह हुमांयू का सहयोग करेगा. इसके बदले में हुमांयू ने कहा कि कामरान अपनी बेटी की शादी अकबर से कर दे और काबुल उन्हें भेंट में दे दे और हुमांयू के साथ खुद हिंदुस्तान पर विजय के लिए चले.

कामरान की तरफ से हुमांयू के संदेश का कोई जवाब नहीं आया तो हुमांयू ने काबुल दुर्ग पर हमला कर दिया. जब कामरान और हुमांयू की सेना में लड़ाई शुरू हुई तो कामरान के सैनिक हुमांयू की तरफ हो गए और कामरान युद्ध में टिक नहीं सका और युद्ध के मैदान से भाग निकला. कामरान सिर मुंडवाकर दरवेशों के वेश में अफगानों की शरण में चला गया.

 

नवंबर, 1553 में गखर के शासक गुलाम आदम ने कामरान को कैद में लेकर हुमांयू के सुपूर्द कर दिया, लेकिन हुमांयू के दरबारियों ने कामरान को जान से मारने की सलाह दी और मुल्ला-मौलवियों से लिखवाकर कहा कि इससे अल्लाह खुश होगा. हालांकि, हुमांयू इससे सहमत नहीं हुआ, लेकिन उसने दरबारियों को इस बात पर राजी कर लिया कि कामरान की आंखें फोड़ दी जाएं और उसके प्राण बख्श दिए जाएं. इसके बाद हुमांयू के दरबारियों ने कामरान की आंखों में तब तक चाकू चलाया, जब तक कि उसको दिखना बिल्कुल बंद न हो जाए. गुलबदम बेगम ने भी इस वाकिए के बारे में लिखा है.



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