US Iran War: खामेनेई के बाद अब लारीजानी का अंत, क्या इजरायल ने जानबूझकर अमेरिका को फंसाया? समझें पूरी कहानी


ईरान के सबसे ताकतवर सुरक्षा चीफ और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (SNSC) के सचिव अली लारीजानी की इजरायली हवाई हमले में मौत हो गई है. उनके साथ बेटे मुर्तुजा लरीजानी, ऑफिस हेड अली रेजा बियात और कई बॉडीगार्ड भी मारे गए. ईरान ने खुद इसकी पुष्टि की. इजरायल ने इसे ‘सटीक ऑपरेशन’ बताया, लेकिन ईरान की तरफ से साफ संदेश है कि अब बदला बहुत भारी होगा. 

अब शांति की राह खत्म, युद्ध लंबा खिंचेगा

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इजरायल ने लारीजानी को इसलिए मारा क्योंकि वे शांति और बातचीत के सबसे बड़े समर्थक थे. एक एक्सपर्ट ने कहा, ‘इजरायल ने जानबूझकर शांति की उम्मीद को टॉरपीडो कर दिया. लारीजानी ही वो शख्स थे जो ट्रंप प्रशासन के साथ कोई डील कर सकते थे. उनकी मौत के बाद अब बातचीत या शांति की कोई राह नहीं बची.’

अली लरीजानी की मौत सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या के बाद ईरान का सबसे बड़ा झटका है. अब ईरान का कहना है कि जवाबी हमले और भी तेज और भारी होंगे. कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस घटना से युद्ध और लंबा खिंच जाएगा. ईरान की तरफ से पहले ही मिसाइल और ड्रोन हमले तेज हो चुके हैं. क्लस्टर मुनिशन का इस्तेमाल बढ़ गया है. इजरायल की तरफ से भी और हमले होने की आशंका है. दोनों तरफ से अब कोई डी-एस्केलेशन की उम्मीद नहीं दिख रही.

अली लरीजानी कौन थे और उनकी मौत इतनी बड़ी क्यों?

अली लारीजानी का जन्म 1958 में इराक के नजफ में हुआ था. वे एक बेहद प्रभावशाली धार्मिक परिवार से थे. उनके पिता आयतुल्लाह मिर्जा हाशिम अमोली एक बड़े धर्मगुरु थे. लारीजानी परिवार को ‘ईरान का केनेडी परिवार’ कहा जाता था क्योंकि उनके कई भाई ईरान की राजनीति और सुरक्षा में टॉप पर रहे. 

वे पढ़े-लिखे और प्रैग्मेटिस्ट नेता थे. शरीफ यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस में BSc, तेहरान यूनिवर्सिटी से वेस्टर्न फिलॉसफी में M.A. और Phd. 1980 में IRGC के डिप्टी कमांडर रहे, फिर IRIB (रेडियो-टीवी) के चीफ, विदेश मंत्री और संसद स्पीकर भी बने. लेकिन सबसे अहम वे SNSC के सचिव थे. यह पद ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम का मुख्य कोऑर्डिनेटर माना जाता है. 2015 के JCPOA परमाणु डील में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी.

सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद लारीजानी ही देश के डी-फैक्टो लीडर बन गए थे. वे IRGC और सत्ता के बीच ब्रिज थे. बातचीत और समझौते के पक्षधर थे. ओमान के जरिए अमेरिका-ईरान के बीच कुछ वार्ता की संभावनाएं बन रही थीं.



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