ईरान वॉर से भारी ऊर्जा संकट, जानें कैसे निपट रहे पड़ोसी पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की अपील की थी. उन्होंने कहा था कि वैश्विक हालात को देखते हुए ऊर्जा बचत अब केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी बन चुकी है. पीएम मोदी की यह अपील ऐसे समय आई है जब ईरान-इजरायल तनाव और पश्चिम एशिया संकट के कारण दुनिया भर में ईंधन की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है.

पड़ोसी देशों पर कितना हुआ ऊर्जा संकट का असर?

पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और म्यांमार जैसे पड़ोसी देश गंभीर ईंधन संकट से जूझ रहे हैं, जबकि भारत ने अब तक पेट्रोल-डीजल की कीमतों को स्थिर रखकर आम जनता को बड़ी राहत दी है. फरवरी 2026 से मई 2026 के बीच अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जिसका सबसे बड़ा असर दक्षिण एशियाई देशों पर पड़ा. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक उछाल ने पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार जैसी अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया है. दूसरी ओर, भारत ने इस वैश्विक संकट के बीच ईंधन कीमतों को स्थिर बनाए रखकर खुद को अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में रखा है.

भारत में फरवरी 2026 में पेट्रोल की कीमत लगभग ₹91.30 प्रति लीटर थी और 10 मई 2026 तक यह लगभग उसी स्तर पर बनी रही. वैश्विक युद्ध जैसी परिस्थितियों और तेल बाजार में दबाव के बावजूद घरेलू कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. यह स्थिरता इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है. इसके बावजूद रणनीतिक भंडारण, विविध स्रोतों से आयात और कर ढांचे के संतुलन ने आम उपभोक्ताओं को राहत दी.

पाकिस्तान: महंगाई और टैक्स का दोहरा बोझ

पाकिस्तान की स्थिति सबसे गंभीर दिखाई दे रही है. वहां पेट्रोल की कीमतें 400 से 450 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थीं. भारतीय रुपए में अगर देखें तो ये लगभग ₹122 से ₹133 प्रति लीटर बैठती है. 9 मई 2026 को सरकार ने पेट्रोल की अधिकतम डिपो कीमत 414.78 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तय की, जो भारतीय मुद्रा में करीब 123 रुपए प्रति लीटर के बराबर है. इसमें लगभग 144.26 पाकिस्तानी रुपये टैक्स और सरकारी शुल्क थे, यानी कुल कीमत का करीब 34.8 प्रतिशत हिस्सा केवल अप्रत्यक्ष करों का था.

ऊर्जा संकट के कारण पाकिस्तान सरकार ने दफ्तरों के समय घटाए, गैर-जरूरी रोशनी पर रोक लगाई और बिजली खपत सीमित करने जैसे कदम उठाए. आर्थिक संकट से जूझ रहे देश में ईंधन की बढ़ती कीमतें आम जनता की मुश्किलें और बढ़ा रही हैं.

म्यांमार: सबसे भयावह स्थिति

म्यांमार में हालात और भी खराब रहे. फरवरी 2026 में जहां पेट्रोल की कीमत लगभग 2,700 म्यांमार क्यात प्रति लीटर थी, जो भारतीय मुद्रा में करीब ₹95 थी, वहीं मई तक यह बढ़कर लगभग 5,500 क्यात यानी करीब ₹193 प्रति लीटर पहुंच गई. यह लगभग 102 प्रतिशत की वृद्धि है. राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर आपूर्ति तंत्र के कारण वहां ईंधन संकट ने परिवहन और व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया.

श्रीलंका: राशनिंग तक पहुंचा संकट

श्रीलंका में पेट्रोल की कीमत फरवरी में लगभग 240 श्रीलंकाई रुपये प्रति लीटर थी, जो मई तक बढ़कर करीब 338 श्रीलंकाई रुपये प्रति लीटर पहुंच गई. भारतीय मुद्रा में यह करीब ₹106 प्रति लीटर बैठती है. आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहे देश में सरकार को क्यूआर कोड आधारित राशनिंग प्रणाली लागू करनी पड़ी. लोगों को सीमित मात्रा में ईंधन दिया जा रहा है ताकि खपत नियंत्रित की जा सके. बढ़ती कीमतों ने श्रीलंका के बजट और परिवहन व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाला है.

नेपाल: दक्षिण एशिया में सबसे महंगा ईंधन

नेपाल में पेट्रोल की कीमतें दक्षिण एशिया में सबसे ऊंचे स्तरों में दर्ज की गईं. वहां पेट्रोल 219 नेपाली रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया, जो भारतीय मुद्रा में लगभग ₹137 प्रति लीटर के बराबर है. भारत से आपूर्ति जारी रहने के बावजूद वैश्विक बाजार का असर वहां साफ दिखाई दिया.

बांग्लादेश: आयात पर भारी निर्भरता

बांग्लादेश अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 95 प्रतिशत आयात करता है. मई 2026 तक वहां पेट्रोल की कीमत लगभग 116 टका प्रति लीटर पहुंच गई, जो भारतीय मुद्रा में करीब ₹85 प्रति लीटर बैठती है. संकट के बीच भारत ने 10 मार्च 2026 को बांग्लादेश को 5000 टन डीजल भेजा और आगे भी आपूर्ति सहायता जारी रखी. हालांकि वहां कीमतों में बढ़ोतरी हुई, लेकिन पाकिस्तान और म्यांमार जैसी खराब स्थिति नहीं बनी.

चीन: भारत के बराबर पहुंची कीमतें

चीन की स्थिति भी दिलचस्प रही. फरवरी में वहां पेट्रोल लगभग 6.5 युआन प्रति लीटर यानी करीब ₹75 प्रति लीटर था, लेकिन युद्ध और आपूर्ति संकट के बाद कीमतें बढ़कर लगभग 7.9 युआन यानी ₹91 प्रति लीटर तक पहुंच गईं. अब चीन और भारत में पेट्रोल की कीमतें लगभग बराबरी के स्तर पर आ गई हैं.

पूरे दक्षिण एशिया में इस संकट का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं है. कई देशों में स्ट्रीट लाइट बंद करने, बाजार जल्दी बंद कराने, वर्क फ्रॉम होम लागू करने और बिजली बचाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. इसके बीच भारत की भूमिका क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने वाली शक्ति के रूप में उभरी है. भारत ने पड़ोसी देशों को ईंधन आपूर्ति जारी रखकर न केवल रणनीतिक संतुलन बनाए रखा, बल्कि यह भी दिखाया कि वैश्विक संकट के दौर में मजबूत आर्थिक प्रबंधन कितना महत्वपूर्ण होता है.

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