प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर फैसले का इंतजार करें…. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से क्यों कही यह बात?



सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर फैसला आने का इंतजार करने को कहा है. कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से यह बात शारीरिक शिक्षा और खेल विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2025 को लेकर कही है. तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि ने विधेयक पर मंजूरी देने के बजाय इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया था. उनके इस फैसले को तमिलनाडु सरकार ने चुनौती दी है.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई (CJI BR Gavai) और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि इस मुद्दे पर संविधान पीठ के प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर फैसले के बाद मामले की सुनवाई की जाएगी.  पीठ ने कहा, ‘आपको प्रेजिडेंशियल रेफरेंस के नतीजे का इंतजार करना होगा. आपको मुश्किल से चार हफ्ते इंतजार करना होगा. प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर 21 नवंबर (सीजेआई गवई के रिटायरमेंट) से पहले फैसला लिया जाना है.’

अप्रैल में तमिलनाडु के 10 विधेयकों के राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास लंबित होने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने एक फैसला दिया था. कोर्ट ने सभी विधेयकों को परित करार दिया था. साथ ही, यह भी कहा था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को एक तय समय सीमा के भीतर ही फैसला लेना चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता तो कोर्ट दखल दे सकता है, जिस पर जुलाई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रेजिडेंशियल रेफरेंस भेजकर सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल किए थे.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर 11 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. रेफरेंस में पूछा गया था कि क्या एक संवैधानिक अदालत राज्य विधानसभाओं की ओर से पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा निर्धारित कर सकती है.

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में कहा है कि विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजने का राज्यपाल का फैसला स्पष्ट रूप से असंवैधानिक, संविधान के अनुच्छेद 163(1) और 200 का उल्लंघन है और प्रारम्भ से ही अमान्य है.’

याचिका के अनुसार, विधेयक को 6 मई 2025 को राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया था. साथ ही मुख्यमंत्री की सलाह भी थी कि इसे मंजूरी दी जाए. हालांकि, 14 जुलाई को राज्यपाल ने यूजीसी विनियम, 2018 के खंड 7.3 के साथ कथित टकराव का हवाला देते हुए विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज दिया, जिस पर राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम उनके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के बाहर है.



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