जब कोई नेता महिलाओं को ‘सोच’ के आधार पर बांटने लगे, तो समझ लीजिए राजनीति अपने सबसे असहज मोड़ पर है. अखिलेश यादव का हालिया बयान केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि उस गहरी बेचैनी का संकेत है जो तब सामने आती है जब ‘आधी आबादी’ का भरोसा धीरे-धीरे खिसकने लगता है. महिलाओं को ‘पिछड़ी सोच’ और ‘आधुनिक सोच’ में बांटने की कोशिश पहली नजर में भले ही वैचारिक बहस लगे, लेकिन इसके पीछे की राजनीति कहीं ज्यादा गहरी है. यह उस प्रयास का संकेत है, जहां पारंपरिक वोट बैंक बदल रहा है और उसे रोकने के लिए नए-नए नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं. यही वजह है कि यह बयान केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए. खासकर तब, जब इसी राजनीति का रिकॉर्ड हमेशा से महिलाओं के अधिकारों से जुड़े बड़े फैसलों पर सवालों के घेरे में रहा हो.
महिलाओं की ‘सोच’: राजनीतिक वर्गीकरण का नया तरीका
समाज को अलग-अलग खांचों में बांटने की राजनीति नई नहीं है. लेकिन, महिलाओं को ‘आधुनिक’ और ‘पिछड़ी’ सोच में बांटना इस रणनीति का नया रूप जरूर है. यहां समस्या केवल शब्दों की नहीं है, बल्कि उस मानसिकता की है, जो यह मानकर चलती है कि महिलाओं की सोच को भी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से परिभाषित किया जा सकता है. यह दृष्टिकोण महिलाओं की स्वतंत्रता को स्वीकार करने के बजाय उन्हें एक तय फ्रेम में फिट करने की कोशिश करता है. अखिलेश के मौजूदा प्रयास में जिस पीडीए की वह बात करते हैं, उसे महिलाओं में भी वर्गीकरण का एक अलग आधार बनाया जाने की कोशिश की जा रही है.
जब संसद में मौका था, तब रुख क्या था?
यहां सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है. एक तरफ महिलाओं को ‘नई सोच’ का पाठ पढ़ाया जा रहा है, और दूसरी तरफ जब संसद में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का मौका आया, तब समाजवादी पार्टी का रुख बिल्कुल अलग नजर आया. नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संशोधन), जिसे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी जल्दी बढ़ाने का एक बड़ा कदम माना गया (नारी शक्ति वंदन अधिनियम- 2023 में पारित हो चुका है, जिसमें महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण तय हैं), उसे सपा ने लोकसभा में समर्थन नहीं दिया. अब सवाल यह है कि जो दल संसद में महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने वाले संशोधन विधेयक के साथ खड़ा नहीं हुआ, वह आज किस नैतिक आधार पर महिलाओं को ‘आधुनिक’ और ‘पिछड़ी’ सोच में बांटने का प्रयास कर रहा है?
विरासत का बोझ, और ‘नई सोच’ का दावा
राजनीति केवल वर्तमान से नहीं, अतीत से भी तय होती है. मुलायम सिंह यादव के कई बयान आज भी यह याद दिलाते हैं कि महिलाओं को लेकर सोच किस स्तर की
रही है. “लड़के हैं, गलती हो जाती है” जैसे बयान केवल विवाद नहीं थे, बल्कि उस दृष्टिकोण का संकेत थे जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपराध को हल्के में लिया गया. ऐसे में, जब उसी राजनीतिक धारा से जुड़े नेता आज ‘नई सोच’ का दावा करते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सोच बदली है, या केवल शब्दों का चयन बदल गया है.
असल मुद्दों से दूरी, बहस को भटकाने की कोशिश
महिलाओं के लिए असली मुद्दे हमेशा स्पष्ट रहे हैं: सुरक्षा, सम्मान और अवसर. लेकिन, इन मुद्दों पर जवाब देने के बजाय अगर बहस को ‘सोच’ के वर्गीकरण की ओर मोड़ा जाए, तो यह संकेत देता है कि असली सवालों से बचा जा रहा है. सपा शासन के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर बनी धारणा आज भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा है. यही अनुभव महिला वोटर के निर्णय को प्रभावित करता है, और यही कारण है कि अब उसके राजनीतिक रुझान में बदलाव दिखाई दे रहा है.
बदलता समीकरण, और बढ़ती बेचैनी
महिला वोटर अब पहले जैसी नहीं रही. वह केवल पहचान आधारित राजनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि अपने अनुभव और अपेक्षाओं के आधार पर निर्णय ले रही है. यही बदलाव राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बनता है. और अक्सर ऐसे ही समय में नए नैरेटिव सामने आते हैं, जो वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर एक नई बहस खड़ी करते हैं. अखिलेश यादव का बयान इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जहां वर्गीकरण के जरिए एक नई राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश हो रही है.
‘आधी आबादी’ अब तय कर रही है दिशा
यह तो सीधे तौर पर स्पष्ट है कि महिलाओं को ‘पिछड़ी’ और ‘आधुनिक’ सोच में बांटना एक सतही राजनीतिक प्रयास है. आज की महिला खुद को इस तरह के
वर्गीकरण में सीमित नहीं करती. वह यह देखती है कि कौन उसके अधिकारों के लिए खड़ा है और कौन केवल बयान दे रहा है. संसद में लिए गए फैसले, जमीन पर
काम, और सुरक्षा का अनुभव, यही उसके निर्णय का आधार बनते हैं. ‘आधी आबादी’ अब केवल वोट बैंक नहीं है. वह राजनीति की दिशा तय करने वाली शक्ति
बन चुकी है. और शायद यही वह सच्चाई है, जो इस तरह के बयानों के पीछे छिपी वास्तविक चिंता को उजागर करती है.
(लेखक इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में वकील हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर निरंतर लेखन करते हैं.)