अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी जंग को एक महीना पूरा होने को आया है, लेकिन अभी भी युद्ध की आग ठंडी नहीं पड़ी है. कई देश शांति-समाधान की कोशिश में जुटे हैं. पाकिस्तान भी अमेरिका-ईरान शांति वार्ता की मेजबानी करने तैयारी में है. युद्ध में ‘चौधरी’ बनने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब के साथ किए गए एक समझौते के चलते युद्ध में घसीटे जाने का भी डर भी सताने लगा है. आइए जानते हैं पाकिस्तान ईरान-यूएस के बीच समझौता क्यों कराना चाहता है.
मध्यस्थ क्यों बन रहा पाकिस्तान?
पाकिस्तान खुद को अमेरिका और ईरान के बीच में मध्यस्थ के तौर पर पेश कर रहा है, जिससे पश्चिमी एशिया में छिड़ी जंग खत्म हो सके और उसकी पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाया जा सके. इसी को लेकर पाकिस्तान 30 मार्च को राजधानी इस्लामाबाद में तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के साथ बैठक करने जा रहा है. उसको यह डर सता रहा है कि सऊदी अरब के साथ उसका रक्षा समझौता उसे क्षेत्रीय संघर्ष में और भी गहराई तक खींच सकता है. इसीलिए वह मौजूदा सुरक्षा प्रतिबद्धताओं के माध्यम से युद्ध में घसीटे जाने से भी बचना चाहता है.
कहीं युद्ध में घसीटे जाने का डर तो नहीं?
दरअसल, पाकिस्तान की ओर से कथित तौर पर अमेरिका की ओर से दिए गए 15 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को ईरान को सौंप दिया है और बातचीत की मेजबानी की भी पेशकश की है, लेकिन इसके पीछे पाकिस्तान का एक डर भी बताया जाता है. बता दें कि बीते साल ही पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच में एक डिफेंस डील हुई थी, जो अब उसके लिए सिरदर्द बनती दिख रही है. सऊदी अरब में ईरान के हुए हमलों ने इसे बढ़ा दिया है. पाकिस्तान इस जंग में किसी एक पक्ष का साथ देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे वह बचना चाहता है.
पाकिस्तान के सामने क्या चुनौती?
पाकिस्तान उस दोराहे पर खड़ा है, जहां उसके सामने सऊदी अरब के सैन्य संबंधों और ईरान के साथ व्यवहारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है. घरेलू दवाब इसे और बढ़ा देता है, जहां अमेरिका-इजरायल का विरोध हो रहा है और ईरान के लिए सहानुभूति दिख रही है. ऐसे में अमेरिका या सऊदी अरब दोनों के साथ खुले तौर पर आने से अशांति का खतरा है. कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी कूटनीति में इसलिए शामिल हुआ है ताकि वह लड़ाई में घसीटे जाने से बच सके.