सिंधु जल संधि निलंबन के बाद भारत ने चिनाब नदी पर जलविद्युत परियोजना को दी मंजूरी, दहशत में पाकिस्तान


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सिंधु और उसकी सहायक नदियों के पानी का पूरा इस्तेमाल करने को लेकर केंद्र की मोदी सरकार ने पाकिस्तान को बड़ा झटका दिया है. पर्यावरण मंत्रालय के एक पैनल ने जम्मू-कश्मीर के किश्तवार में चिनाब नदी पर 260 मेगावाट की दुलहस्ती चरण-II जलविद्युत परियोजना को मंजूरी दे दी है. ये मंजूरी ऐसे समय में दी गई है जब पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) अभी भी निलंबित है.

पहलगाम आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने इस्लामाबाद के साथ 1960 की सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को स्थगित कर दिया था. इस फैसले के बाद ही नई दिल्ली ने सिंधु नदी की पश्चिमी सहायक नदियों के पानी के इस्तेमाल के लिए तेजी से कदम उठाए. इन सबका मकसद भारत की जलविद्युत क्षमता को अधिकतम करना और जल सुरक्षा को प्राथमिकता देना था.

सिंधु, झेलम और चिनाब का पूरा पानी इस्तेमाल करेगा भारत
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (एनएचपीसी) ने जुलाई में जम्मू और कश्मीर में इसी नदी पर 1,856 मेगावाट की सावलकोट जलविद्युत परियोजना के लिए अंतरराष्ट्रीय निविदाएं आमंत्रित की थीं. अंतर्राष्ट्रीय जल संरक्षण संधि के पालन के कारण भारत के सिंधु, झेलम और चिनाब के पानी के इस्तेमाल को लेकर काफी अड़चनें थीं, जो अब IWT के स्थगित होने के बाद खत्म हो गई हैं. स्वीकृत की गई नई पनबिजली परियोजनाएं सभी ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ परियोजनाएं हैं, जो अब संधि निलंबित होने के बाद वैध हैं. 

पाकिस्तान की कृषि प्रभावित
इसके बावजूद इस्लामाबाद ने बार-बार विरोध जताया है और नई दिल्ली पर पाकिस्तान के खिलाफ जल युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया है. पिछले सप्ताह इस्लामाबाद ने भारत से उसकी सीमा में प्रवेश करने वाली चिनाब नदी में पानी के घटते और अनियमित प्रवाह को लेकर नए आरोप लगाए. पाकिस्तान बार-बार दावा करता रहा है कि नदी के जल प्रवाह में रुकावट से उनकी खेती-किसानी खतरे में पड़ गई है. 

पाकिस्तान ने बताया गंभीर उल्लंघन
भारत के इस फैसले को लेकर पीपीपी नेता और पाकिस्तान के पूर्व मंत्री शेरी रहमान ने कहा कि यह चिनाब नदी के जल का गंभीर दुरुपयोग है. रहमान के कार्यालय ने एक पोस्ट में कहा कि चिनाब नदी पर दुल्हास्ती परियोजना को भारत की मंजूरी सिंधु जल संधि का स्पष्ट और गंभीर उल्लंघन है. विवादित नदियों पर कोई भी एकतरफा कार्रवाई पाकिस्तान के मान्यता प्राप्त जल अधिकारों को सीधे तौर पर कमजोर करती है और क्षेत्रीय शांति के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है.

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