Balochistan Attack: खत्म होगा BLA या टूटेगा बलूचिस्तान, पाकिस्तान में आखिर चल क्या रहा है?


अब या तो बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी या फिर बलूचिस्तान पाकिस्तान से टूटकर अलग देश बन जाएगा. क्योंकि अभी बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी ने जो ऑपरेशन हेरोफ चलाया और जिसके बाद पाकिस्तानी सेना ने बीएलए के लोगों को चुन-चुनकर मारा है, उसके बाद दूसरी कोई सूरत नजर नहीं आती. आज क्लियर कट बात होगी उस बलूचिस्तान की, जो पाकिस्तान के लिए नासूर बन गया है और जिसकी आजादी का ख्वाब बलोच ही नहीं बल्कि हिंदुस्तान की भी आधी से ज्यादा आबादी पिछले कई दशकों से देख रही है.

बलूच भाषा में भयंकर तूफान के लिए एक शब्द इस्तेमाल होता है. उसे कहते हैं हेरोफ. अंग्रेजी में समझें तो ब्लैक स्टॉर्म. यानी कि ऐसा तूफान जो बेहद विध्वंशक हो और जिसके सामने मजबूत से मजबूत चीज भी टिक न पाए. बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी के सामने सबसे मजबूत है पाकिस्तानी आर्मी. और इसी पाकिस्तानी आर्मी से लड़ने के लिए बलोच लोगों ने जो हथियारबंद ऑपरेशन शुरू किया, उसे नाम दिया ऑपरेशन हेरोफ.

31 जनवरी 2026 की शाम से शुरू हुए इस ऑपरेशन हेरोफ के दूसरे चरण में बलूचिस्तानी लिबरेशन ऑर्मी ने अपने इतिहास के सबसे बड़े और सबसे घातक हमलों को अंजाम दिया. बीएलए ने एक ही साथ बलूचिस्तान के कई जिलों क्वेटा, ग्वादर, मस्टुंग और नोश्की में एक साथ बम धमाके किए. बीएलए ने इस ऑपरेशन के लिए अपनी सेना की सभी ईकाइयों जैसे फिदायीन हमलावर, मजीद ब्रिगेड, फतेह स्क्वाड, इंटेलिजेंस विंग और विशेष टेक्टिकल टीमों को एक साथ मैदान में उतारा. इन सबने मिलकर पूरे बलूचिस्तान में तबाही मचाई. सरकारी बैंकों पर कब्जा कर लिया, जेल के कैदी छुड़ा ले गए, कई सरकारी दफ्तरों को आग लगा दी और पाकिस्तानी सेना के कई ठिकानों पर अपना कब्जा कर लिया.

सबसे बड़ा और घातक हमला तो बीएलए की दो महिला फिदायिनों ने किया, जिनके वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं. मजीद ब्रिगेड की फिदायीन आसिफा मेंगल ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के नोश्की शिविर को निशाना बनाकर खुद को उड़ा दिया. तो हवा बलोच ने पाकिस्तानी सेना पर अंधाधुंध फायरिंग की और सैनिकों को मारने के बाद खुद को भी बम धमाके में उड़ा लिया. इन हमलों के बाद बीएलए ने बयान जारी कर कहा कि उनके इस हमले में पाकिस्तान के 200 सैनिक मारे गए हैं. 18 सैनिकों को बंदी बना लिया गया है और क्वेटा, नुश्की, कलात, दलबदीन, खारन, पंजगुर, ग्वादर और पशनी जैसे इलाकों में अपना कब्जा बढ़ा लिया है.

वहीं पाकिस्तानी सेना ने भी बीएलए के इस ऑपरेशन का जवाब दिया. और ऐसा जवाब दिया कि बलूचिस्तान लिबरेशन ऑर्मी की कमर ही टूट गई. ऑपरेशन हेरोफ को अंजाम देने में बीएलए के 18 लड़ाके तो पहले ही मारे गए थे, जिनमें अकेला मजीद ब्रिगेड के 11 फिदायीन थे. इसके अलावा फतेह स्क्वाड के 4 और STOS यूनिट के भी 3 लड़ाके ऑपरेशन के दौरान मारे गए थे. लेकिन जब पाकिस्तानी सेना ने भी मारना शुरू किया तो उसने बीएलए के 150 से ज्यादा लड़ाकों को मार गिराया. इस पूरे ऑपरेशन और जवाबी कार्रवाई के दौरान 50 से भी ज्यादा आम पाकिस्तानी नागरिक मारे गए हैं, जिसने न सिर्फ पाकिस्तानी सेना की नाकामी सामने ला दी है बल्कि बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं. क्योंकि पूरे इलाके में इंटरनेट बंद करना पड़ा. ट्रेन रोक दी गईं, सड़क पर ट्रैफिक जाम हो गया और पूरा क्वेटा वीरान सा नजर आने लगा.

ऐसे में सवाल उठता है कि अब आगे क्या. बलूचिस्तान की ये जंग बहुत पुरानी है और इसमें कभी बलोच लिबरेशन आर्मी हावी होती है तो कभी पाकिस्तानी सेना. लेकिन इन दोनों की लड़ाई में पिसता आम पाकिस्तानी है, जिसे कोई स्थायी समाधान चाहिए. ऐसे में रास्ता क्या है और इसका जवाब मिलता है बलूचिस्तान के इतिहास और भूगोल से, जिसमें भारत से भी ज्यादा दिलचस्पी चीन की है.

इतिहास तो यही कहता है कि बलूचिस्तान जिस आजादी की लड़ाई फिलवक्त लड़ रहा है, वो 1948 से पहले सच में एक आजाद मुल्क था. वो चार अलग-अलग प्रिंसली स्टेट को मिलाकर बना था. कलात, मकरान, लास बेला और खारन. जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो जिस तरह से भारत में कई रियासतें थीं, उसी तरह पाकिस्तान में भी कई रियासतें थीं. और वो रिसायतें भी पाकिस्तान में न जाकर अलग ही रहना चाहती थीं. लेकिन जिस तरह से भारत में सरदार पटेल की पहल पर सारी रियासतों का विलय हुआ, वैसे ही पाकिस्तान ने भी रियासतों का विलय करवाया. बलूचिस्तान की भी तीन रियासतें यानी कि मकरान, लास बेला और खारन तो तुरंत ही पाकिस्तान के साथ विलय के लिए तैयार हो गईं.

कलात रियासत के मुखिया अहमद यार खान विलय के लिए तैयार नहीं हुए. वो पाकिस्तान के कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना को अपना पिता कहते थे, लेकिन ये भी चाहते थे कि कलात एक अलग ही देश बने, वो पाकिस्तान के साथ न जाए. लेकिन पाकिस्तान का दबाव था तो लंबी बातचीत के बाद 27 मार्च 1948 को अहमद यार खान ने पाकिस्तान के साथ विलय की शर्तों को मान लिया. लेकिन अहमद यार खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम और प्रिंस मोहम्मद रहीम ने बगावत कर दी.

दोनों बागी भाइयों ने मिलकर करीब एक हजार लड़ाकों की सेना बनाई और नाम दिया दोश्त-ए-झालावान.इन दोनों भाइयों की सेना ने पाकिस्तानी सेना पर हमले शुरू कर दिए. पाकिस्तानी सेना ने जवाबी हमला किया. और दोनों भाई भागकर अफगानिस्तान चले गए. लेकिन अफगानिस्तान ने भी उनकी मदद नहीं की. तो उन्हें कलात लौटना पड़ा. यहां आते ही पाकिस्तानी सेना ने दोनों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. ये पहला मौका था जब बलूचिस्तान में विद्रोह हुआ और उसे पाकिस्तानी सेना ने कुचल दिया.

लेकिन बलोच लोगों के मन में आजादी का खयाल पनपते रहा. कभी नवाब नौरोज खान ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया तो कभी शेर मोहम्मद बिजरानी मारी ने गोरिल्ला वॉर तकनीक का इस्तेमाल करके बलोच लोगों को भड़काने का काम किया. लेकिन विद्रोहियों को कभी सफलता नहीं मिली. आखिरकार 1970 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहिया खान ने बलूचिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान का चौथा प्रांत घोषित कर दिया. इसकी वजह से बलूचिस्तचान के लोग और भी भड़क गए. रही-सही कसर जुल्फिकार अली भुट्टो ने पूरी कर दी और उन्होंने 1973 में बलूचिस्तान की सरकार को भंग करके वहां मॉर्शल लॉ लगा दिया.

इस बात को बीते 54 साल हो गए हैं. और इन 42 साल में बलूचिस्तान में कभी भी शांति नहीं आ पाई है. क्योंकि इन 52 साल में अलग-अलग गुप्स बलूचिस्तान की आजादी की मांग करते रहते हैं, हथियार उठाते रहते हैं, पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तानी लोगों पर हमले करते रहते हैं और पाकिस्तान इन हमलावरों को आतंकी मानता है.अब भी ईरान वाले बलूचिस्तान, अफगानिस्तान वाले बलूचिस्तान और पाकिस्तान वाले बलूचिस्तान को मिलाकर कम से कम 20 ऐसे ग्रुप्स हैं, जो इन देशों की सरकारों के लिए आतंकी हैं. उदाहरण के लिए अभी पाकिस्तान में जो आतंकी हमला हुआ है, उसकी जिम्मेदारी ली है बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी बीएलए ने, जो फिलहाल पाकिस्तान में सबसे बड़ा बलोच आतंकी ग्रुप है. इसके अलावा बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट बीएलएफ, लश्कर-ए-बलूचिस्तान, बलूचिस्तान लिबरेशन, यूनाइटेड फ्रंट, बलोच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन, बलोच नेशनलिस्ट आर्मी, बलोच रिपब्लिकन आर्मी और यूनाइटेड बलोच आर्मी जैसे संगठन हैं, जो बलूचिस्तान की आजादी के लिए लड़ते रहते हैं.

वहीं बलूचिस्तान में ही धर्म के आधार पर भी अलग-अलग गुट बने हुए हैं, जिनमें शिया और सुन्नी हैं. जैसे अंसार-उल-फुरकान सुन्नी बलोच मिलिटेंट ग्रुप है और ईरान के लिए आतंकी संगठन है. इसके अलावा जैश-उल-अदल, हरकत-अंसार, हिजबुल-फुराकान, इस्लामिक स्टेट, आईएसआईएस-खोरासान, तहरीक-ए-तालिबान, लश्कर-ए-झांगवी और सिपाह-ए-शहाबा जैसे ग्रुप्स भी बलूचिस्तान में आतंकी हमलों के लिए कुख्यात हैं. रही बात अब अरब सागर की बलूचिस्तान से लगती सीमा और इसके बलूचिस्तान में आतंकी हमलों के वजह होने की, तो इसकी कहानी का सिरा जुड़ता है चीन से, जो पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानी कि सीपीईसी बना रहा है. और ये सीपीईसी गुजरता है बलूचिस्तान से होकर, जिसके पास ग्वादर पोर्ट है और इसी ग्वादर पोर्ट तक पहुंच के लिए ही चीन इतनी बड़ी परियोजना पर काम कर रहा है. ऐसे में बलूचिस्तान के जो लोग पहले से ही पाकिस्तान से आजादी चाहते हैं, अब उनके ऊपर चीन एक और खतरे के तौर पर दिखाई देता है. लिहाजा जब भी मौका मिलता है, बलूचिस्तान के संगठन कभी चीन पर तो कभी पाकिस्तान पर हमला करते ही रहते हैं ताकि सीपीईसी कभी पूरा हो ही न पाए.

लेकिन सवाल ये है कि जिस चीन ने सीपीईसी पर अभी तक करीब 25 से 30 अरब डॉलर खर्च कर दिए हैं, वो सिर्फ बलूचिस्तान के विद्रोहियों से डरकर अपने हाथ वापस खींच लेगा. या फिर चीन का जो असल मकसद है, उसे पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक जाएगा ही जाएगा. क्योंकि बलूचिस्तान में सिर्फ वही नहीं है जो ऊपर-ऊपर दिखता है बल्कि बलूचिस्तान में तो प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और दुर्लभ खनिजों का एक बड़ा भंडार है, जिसके बारे में चीन को बखूबी पता है. और जाहिर है कि जब इतनी चीजें उस जगह पर मौजूद हैं, जहां चीन का पैसा लगा है तो वो अपने पैसे को वसूल करने के लिए तो कुछ न कुछ करेगा ही करेगा. लिहाजा चीन ने सीपीईसी की फंडिंग रोक दी है और कहा है कि जब तक सुरक्षा नहीं मिलेगी, पैसा भी नहीं मिलेगा. और पाकिस्तान को तो पैसा चाहिए ही चाहिए, लिहाजा पाकिस्तान के पास इकलौता उपाय यही है कि वो बलूचिस्तान के विद्रोही गुटों और खास तौर से बीएलए को पूरी तरह से खत्म करके ही माने. इसके लिए चीन मदद कर ही रहा है. उसने पाकिस्तान को ड्रोन और फेशियल रिकग्निशन तकनीक दी है ताकि पाकिस्तानी सेना बीएलए लड़ाकों की पहचान कर सके. वहीं चीन के कहने पर ही अमेरिका और ब्रिटेन ने बीएलए को आतंकवादी गुट घोषित कर रखा है. चीन अफगानिस्तान और ईरान से भी कह चुका है कि वो बीएलए को कुचलने में मदद करें.

लेकिन चीन अकेला नहीं है जो पाकिस्तान की मदद कर रहा है. पाकिस्तान की मदद तो अमेरिका को भी करनी ही पड़ रही है, क्योंकि बलूचिस्तान में जो प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना और दुर्लभ खनिजों का बड़ा भंडार है, अमेरिका भी उसपर नज़र गड़ाए बैठा है. उसने बलूचिस्तान के रेको दिक इलाके में खनन परियोजनाओं के लिए 1.25 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है. और ये बात तो साफ है कि जब अमेरिका पैसे लगाएगा, अपने प्रोजेक्ट्स शुरू करेगा तो उसकी सुरक्षा भी करेगा ही करेगा.

ऐसे में जो बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी अभी पाकिस्तान की सेना से ही लड़ रही थी, आने वाले दिनों में उसे चीन की सेना से भी लड़ना पड़ सकता है और अमेरिकी सेना से भी. क्योंकि अभी भले ही पाकिस्तान और उसकी सेना ने अपनी संप्रभुता का हवाला देकर बलूचिस्तान में चीन की सेना की तैनाती को रोक रखा हो, लेकिन जब चीन का नुकसान और बड़ा होगा तो वो अपनी सेना तैनात करेगा ही करेगा. और तब अमेरिका को भी पाकिस्तान में अपने प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा के नाम पर सेना की तैनाती का मौका मिल जाएगा. क्योंकि अमेरिकी सेना पाकिस्तान में कैसे घुसती है और कैसे ऑपरेशन करती है, लादेन की मौत उसका सबसे सटीक उदाहरण है. ऐसे में अभी तक पाकिस्तानी सेना से लड़ने वाले बलोच लड़ाकों का सामना आने वाले दिनों में चीन या अमेरिका की सेना से होगा, तो वो शायद ही कुछ घंटे भी टिक पाएंगे और तब बलोच भले ही खत्म हो जाएं, बलूचिस्तान भले ही पाकिस्तान के साथ रहे, लेकिन वहां असल हुकूमत चीन और अमेरिका की ही होगी, जो हिंदुस्तान कभी नहीं चाहेगा.

क्योंकि इस बलूचिस्तान का जो एक हिस्सा है ग्वादर, वो एक वक्त में भारत का हो सकता था. क्योंकि पाकिस्तान के बनते वक्त यानी कि 1947 में जब मकरान ने पाकिस्तान के साथ विलय की बात मान ली थी, तब भी ग्वादर पोर्ट पाकिस्तान का नहीं हो पाया था. उस वक्त इस पोर्ट पर ओमान के सुल्तान का शासन था, जो ओमान की एक विदेशी रियासत थी. लेकिन 1950 के दशक में ओमान के तत्कालीन सुल्तान सईद बिन तैमूर अपनी इस रियासत को बेचना चाहते थे. खरीदार के तौर पर उन्होंने सबसे पहला ऑफर भारत को दिया. तब भी भारत और ओमान के संबंध बहुत अच्छे हुआ करते थे. लेकिन तब नए-नए आजाद मुल्क को विकसित करने का सपना संजो रहे प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा कि ग्वादर भारत से दूर है, जिसे संभालना मुश्किल होगा. ऐसे में ओमान के सुल्तान ने पाकिस्तान से बात की. और पाकिस्तान ने उस वक्त लगभग तीन मीलियन डॉलर देकर ओमान से इसे खरीद लिया. 8 सितंबर 1958 को ग्वादर पाकिस्तान का हिस्सा हो गया.

अब इसे दूरदर्शिता की कमी कहें या फिर उस वक्त की परिस्थितियां, अगर ग्वादर भारत के जिम्मे होता तो चीन कभी पाकिस्तान में सीपीईसी बना ही नहीं पाता. और भारत की सेना उस समुद्री मोर्चे पर तैनात होती, जिसका एक सिरा पाकिस्तान से मिलता है. यही वजह है कि भारत को जब मौका मिला तो उसने अफगानिस्तान के चाबहार में अपना निवेश किया ताकि ग्वादर की वजह से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई की जा सके. अब जब बलूचिस्तान सुलग रहा है और चीन-अमेरिका पाकिस्तान के साथ मिलकर उस विद्रोह को दबाना चाहते हैं तो भारत बस इंतजार कर सकता है कि बलोच अपने मकसद में कामयाब हों, जिसकी जंग वो 1947 से ही लड़ रहे हैं. 



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