सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) कराने को कानूनन सही ठहराया है. कोर्ट ने कहा है कि मतदाता सूची की जांच और सुधार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने पिछले साल बिहार में हुए SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर यह फैसला दिया है.
सुप्रीम कोर्ट का यह बड़ा फैसला एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, PUCL, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, के सी वेणुगोपाल समेत कुल 19 याचिकाओं पर आया है. कोर्ट ने 29 जनवरी को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था. कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से मना कर दिया है कि SIR करवाने का चुनाव आयोग का फैसला और उसके लिए अपनाई गई प्रक्रिया मनमानी है. कोर्ट ने इस बात को भी अस्वीकार कर दिया है कि SIR के जरिए चुनाव आयोग लोगों की नागरिकता का निर्धारण कर रहा था.
चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव प्रक्रिया के नियंत्रण और मतदाता सूची तैयार करने के अपने अधिकार का हवाला दिया था. साथ ही, जनप्रतिनिधित्व कानून, की धारा 21(3) का भी जिक्र किया था. उसका कहना था कि यह धारा उसे यह अधिकार देती है कि वह मतदाता सूची को साफ-सुथरा करने के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन कर सके और उसके नियम तय कर सके. सुप्रीम कोर्ट ने इन बातों को स्वीकार किया है.
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सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि SIR के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया को मनमाना नहीं कहा जा सकता. इतनी विस्तृत प्रक्रिया के लिए नियम बनाने जरूरी थे और उन्हें बनाने का अधिकार चुनाव आयोग को था. आयोग को यह भी अधिकार था कि वह निवास स्थान और पहचान की पुष्टि के लिए मान्य दस्तावेज तय करे.
फैसला पढ़ते हुए चीफ जस्टिस ने कहा, ‘लोकतंत्र की नींव सिर्फ मतदान की मशीनी प्रक्रिया पर नहीं टिकी है. इसके लिए मतदाता सूची का सटीक और विश्वसनीय होना भी ज़रूरी है. पिछले कुछ दशकों में अलग-अलग कारणों से लोगों का पलायन हुआ है. इसके चलते वोटर लिस्ट में नामों का दोहराव है. इसे ठीक करना जरूरी था.’
कोर्ट ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 16 के तहत, सिर्फ भारत के नागरिक ही वोट दे सकते हैं इसलिए चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करते समय नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का पूरा हक है. कागजात मांगना नागरिकता पर संदेह करना नहीं है. चुनाव आयोग वोटर लिस्ट से नाम हटा सकता है, नागरिकता नहीं छीन सकता. जिनका नाम मतदाता सूची से हट गया है, उनकी नागरिकता बनी हुई है. वह जहां रह रहे थे, वहीं रह सकते हैं
फैसले के अंतिम हिस्से में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग भले ही नागरिकता तय नहीं कर सकता, लेकिन किसी की नागरिकता पर संदेह होने पर उसे केंद्र सरकार को जानकारी देनी चाहिए. जिन लोगों के नाम ‘संदेहास्पद नागरिकता’ के चलते हटाए गए हैं, उनकी सूची 4 सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को सौंपी जाए, ताकि ‘नागरिकता अधिनियम’ के तहत केंद्र सरकार की सक्षम अथॉरिटी उनकी नागरिकता पर फैसला ले सके.
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