चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर पहुंच रहे हैं. वह 2 दिनों तक नॉर्थ कोरिया में रहेंगे और राजधानी प्योंगयांग में उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से मुलाकात करेंगे. यह साल 2026 में शी जिनपिंग की पहली विदेश यात्रा भी मानी जा रही है. इस दौरे को चीन की रणनीतिक जरूरत के रूप में देखा जा रहा है. शी जिनपिंग आखिरी बार 2019 में कोरिया पहुंचे थे, तब उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच परमाणु डिसआर्मेंट को लेकर बातचीत विफल हो गई थी. उस समय चीन और उत्तर कोरिया एक-दूसरे के काफी करीब दिखाई दिए थे, लेकिन बाद में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ दूरी भी देखने को मिली.
रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ती नजदीकियों ने चीन की चिंता बढ़ा दी है. रूस-यूक्रेन वॉर के दौरान रूस और उत्तर कोरिया के संबंध पहले से अधिक मजबूत हुए हैं. आर्थिक सहयोग बढ़ने से उत्तर कोरिया को नई मदद मिली है और उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति भी कुछ हद तक मजबूत हुई है. चीन नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी पूरी तरह रूस के प्रभाव में चला जाए. यही वजह है कि बीजिंग अब प्योंगयांग के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
Xi Jinping reaffirms strong ties before meeting North Korea’s Kim Jong Un
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— ANI Digital (@ani_digital) June 8, 2026
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क्या यह किम जोंग उन की कूटनीतिक जीत है?
हाल के महीनों में दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के संकेत भी मिले थे. एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में चीन के राजदूत की अनुपस्थिति ने अटकलों को जन्म दिया था कि दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं. ऐसे में चीनी राष्ट्रपति का यह दौरा उत्तर कोरिया के लिए बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है.
चीन क्यों नहीं चाहता सीमा पर तनाव?
चीन और उत्तर कोरिया के बीच लगभग 1,400 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. बीजिंग के लिए यह सीमा रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. चीन चाहता है कि उसके पड़ोस में स्थिरता बनी रहे और किसी तरह का सैन्य या राजनीतिक संकट पैदा न हो. इसके अलावा उत्तर कोरिया अपनी नई 5 वर्षीय विकास योजना के तहत पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रहा है. चीन की कंपनियां और निवेशक भी इससे लाभ उठा सकते हैं. इसलिए दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को मजबूत करना चीन की प्राथमिकताओं में शामिल है.
परमाणु कार्यक्रम भी बना बड़ा मुद्दा
उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को लेकर चीन और उत्तर कोरिया के बीच कई बार मतभेद सामने आए हैं. चीन खुले तौर पर यह कहता रहा है कि कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त रखने की दिशा में कोशिश होने चाहिए. उत्तर कोरिया अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय सुरक्षा का जरूरी हिस्सा मानता है. शी जिनपिंग इस यात्रा के दौरान उत्तर कोरिया को यह मैसेज देना चाहेंगे कि क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक फैसलों में चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
चीन का असली मकसद क्या है?
इस यात्रा का सबसे बड़ा मकसद उत्तर कोरिया पर चीन का प्रभाव बनाए रखना माना जा रहा है. रूस के साथ बढ़ती साझेदारी के कारण क्षेत्र में चीन का प्रभाव कुछ कमजोर होता दिखाई दे रहा है. ऐसे में बीजिंग चाहता है कि वह आर्थिक सहयोग, निवेश और राजनीतिक समर्थन के जरिए प्योंगयांग के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करे. शी जिनपिंग का यह दौरा केवल दो नेताओं की मुलाकात नहीं, बल्कि पूर्वी एशिया में बदलते शक्ति संतुलन, रूस-उत्तर कोरिया गठजोड़ और चीन की क्षेत्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है.
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