Middle East Tensios: 108 दिन तक चले भीषण संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच जिस शांति समझौते का एलान हुआ है, उसने पूरी दुनिया को राहत तो दी है, लेकिन इसके साथ ही कई बड़े सवाल भी खड़े कर दिए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने जन्मदिन के मौके पर इस डील का ऐलान करते हुए इसे बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया, वहीं ईरान ने भी लंबी और कठिन बातचीत के बाद समझौते के मसौदे पर सहमति की पुष्टि की.
हालांकि, अब तक इस समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर नहीं हुए हैं और 19 जून को इसे अंतिम रूप देने की बात कही जा रही है. इसके बावजूद वैश्विक स्तर पर इस डील को लेकर चर्चा तेज है कि आखिर इस समझौते में असली जीत किसकी हुई- अमेरिका की या ईरान की.
अगर समझौते की शर्तों और हालात का विश्लेषण किया जाए तो कई मायनों में ईरान इस डील में मजबूत स्थिति में दिखाई देता है. सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका का एक प्रमुख लक्ष्य ईरान में शासन परिवर्तन था, जिसे वह हासिल नहीं कर सका. ईरान की राजनीतिक व्यवस्था और नेतृत्व बरकरार रहा, जो इस संघर्ष के बीच उसकी सबसे बड़ी जीत मानी जा रही है. इसके अलावा, अमेरिका ने अपनी अत्याधुनिक सैन्य ताकत जैसे B-2 बॉम्बर का इस्तेमाल किया, लेकिन इसके बावजूद वह ईरान को पूरी तरह झुका नहीं पाया. महीनों तक हमले झेलने के बाद भी ईरान ने अपने रणनीतिक और सैन्य संतुलन को बनाए रखा और अपनी शर्तों पर बातचीत की मेज तक पहुंचा.
मजबूत स्थित में ईरान
इस पूरे संघर्ष में होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका भी बेहद अहम रही. ईरान ने इसे अपने सबसे बड़े रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया और वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर दिया. इस दबाव का असर यह हुआ कि अमेरिका को भी अपने रुख में नरमी दिखानी पड़ी. समझौते के तहत यह तय हुआ है कि 30 दिनों के भीतर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाई जाएगी और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल दिया जाएगा. इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा और तेल संकट से जूझ रही दुनिया को राहत मिल सकती है.
एक और अहम पहलू यह है कि जिस परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका ने युद्ध छेड़ा था, वह अभी भी अनसुलझा है. समझौते में इस मुद्दे पर कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है, बल्कि इसे आगे की बातचीत के लिए टाल दिया गया है. इसका मतलब यह है कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर तत्काल कोई बड़ा समझौता नहीं किया है. इसके अलावा, ईरान की फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्ति को रिलीज करने पर भी सहमति बनी है, जो उसके लिए आर्थिक रूप से बड़ी राहत साबित होगी. तेल और पेट्रोकेमिकल्स के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की बात भी इस डील का हिस्सा बताई जा रही है.
यूएस का दांव पड़ा कमजोर
हालांकि, इस समझौते के सामने कई चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती बेंजामिन नेतन्याहू की चुप्पी और इजरायल की स्थिति है. इजरायल ने साफ संकेत दिए हैं कि वह अपने सैन्य अभियानों को रोकने के पक्ष में नहीं है, खासकर लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई को लेकर. ऐसे में यह आशंका बनी हुई है कि कहीं इजरायल की रणनीति इस समझौते को पटरी से उतार न दे. इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं है कि होर्मुज जलडमरूमध्य हमेशा के लिए टोल-फ्री रहेगा या सिर्फ सीमित समय के लिए यह व्यवस्था लागू होगी.
यह समझौता एक पूर्ण डील कम और एक प्रारंभिक फ्रेमवर्क ज्यादा लगता है, जिसमें कई मुद्दे अभी भी अधूरे हैं. जहां एक ओर अमेरिका इसे अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर हालात यह संकेत देते हैं कि ईरान ने अपनी कई अहम शर्तें मनवाने में सफलता हासिल की है. आने वाले दिनों में जब इस समझौते पर हस्ताक्षर होंगे और पूरी शर्तें सामने आएंगी, तभी यह साफ हो पाएगा कि असली विजेता कौन है. फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस डील ने युद्ध की आग को ठंडा करने की दिशा में एक बड़ा कदम जरूर बढ़ाया है, लेकिन स्थायी शांति का रास्ता अभी भी चुनौतियों से भरा हुआ है.
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