कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बुधवार (21 जनवरी, 2026) को स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वार्षिक बैठक में अपना संबोधन दिया. उन्होंने कहा कि कनाडा और दुनिया के लिए इस निर्णायक मोड़ पर आपके साथ होना मेरे लिए एक सुखद अनुभव है और एक कर्तव्य भी है.
उन्होंने कहा कि आज में वैश्विक व्यवस्था में आई दरार, एक सुखद कहानी के अंत और उस कठोर वास्तविकता की शुरुआत पर बात करूंगा, जहां महान शक्तियों के बीच भू-राजनीति अब किसी भी तरह की सीमाओं से बंधी नहीं है, लेकिन मैं यह भी आपके सामने रखता हूं कि अन्य देश, विशेष रूप से कनाडा जैसे मध्यम शक्ति वाले देश, पूरी तरह असहाय नहीं हैं. उनके पास एक नई वैश्विक व्यवस्था बनाने की क्षमता है, जो मानवाधाकिरों का सम्मान, सतत विकास, एकजुटता, संप्रभुता और देशों की क्षेत्रीय अखंडता जैसे हमारे मूल्यों को दर्शाए.
हम महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहे हैं- मार्क कार्नी
प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा, ‘कमजोरों की शक्ति की शुरुआत ईमानदारी से होती है. हर दिन हमें याद दिलाया जाता है कि हम महान शक्तियों की प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहे हैं कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ रही है, ताकतवर वही करता है जो वह कर सकता है और कमजोर वही सहता है, जो उसे सहना पड़ता है.’
उन्होंने कहा, ‘हाल के सालों में, बड़ी शक्तियों ने आर्थिक एकीकरण को हथियार बना लिया है. टैरिफ को दबाव के साधन की तरह इस्तेमाल किया गया. वित्तीय ढांचे को दबाव का जरिया बनाया गया. आपूर्ति श्रृंखलाओं को कमजोरी के रूप में भुनाया गया. जब एकीकरण ही आपकी अधीनता का कारण बन जाए, तब आप आपसी लाभ के झूठ के भीतर नहीं जी सकते है. जिन बहुपक्षीय संस्थाओं पर मध्यम शक्तियां निर्भर थीं, उनमें WTO, संयुक्त राष्ट्र, COP- सामूहिक समस्या समाधान की यह पूरी संरचना अब काफी कमजोरी हो चुकी है.’
कनाडा अपनी रणनीतिक सोच में मूलभूत बदलाव किया- मार्क कार्नी
प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा, ‘कनाडा जैसे मध्यम शक्ति वाले देशों के सामने सवाल ये नहीं है कि हमें इस नई वास्तविकता के अनुसार ढलना है या नहीं, हमें ढलना ही होगा. सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ ऊंची दीवारें बनाएंगे या कुछ अधिक महत्वाकांक्षी करेंगे. कनाडा उन शुरुआती देशों में रहा है, जिन्होंने इस चेतावनी को गंभीरता से लिया और अपनी रणनीतिक सोच में मूलभूत बदलाव किया.’
उन्होंने कहा, ‘यह कोई भोला-भाला बहुपक्षवाद नहीं है. यह न हीं कमजोर संस्थाओं पर निर्भरता है. यह उन गठबंधनों का निर्माण है, जो वास्तव में मुद्दा दर मुद्दा काम करते हैं. मध्यम शक्तियों को साथ मिलकर काम करना होगा, क्योंकि अगर आप टेबल पर नहीं हैं, तो आप मेन्यू में हैं.’
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