‘बांग्लादेश गहरे संकट से गुजर रहा, उम्मीद है ईद इससे उबरने की ताकत देगी’, बोलीं शेख हसीना


बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ईद-उल-अजहा के मौके पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस बार त्योहार ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश के लोग गहरे संकट और मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. अवामी लीग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उनका संदेश साझा किया. जिसमें पूर्व पीएम ने लोगों के ‘दर्द और पीड़ा’ पर अफसोस जताया.

शेख हसीना ने कहा, ‘पिछले 21 महीनों में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगातार हिंसा, हमलों और झूठे केस का सामना करना पड़ा है, जबकि कई लोग अब भी जेल में बंद हैं. सिर्फ राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि आम लोग भी भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.’

उन्होंने बच्चों की मौत, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, बिगड़ती कानून-व्यवस्था और कमजोर होती अर्थव्यवस्था पर चिंता जताई. आगे लिखा, ‘सैकड़ों बच्चे खसरे की वजह से काल की गाल में समा रहे हैं, बर्बर हिंसा का दौर जारी है और महिलाओं- बच्चियों के साथ जबरदस्ती हो रही है, कानून व्यवस्था की हालत खराब है और अर्थव्यवस्था ने देश को गर्त में डाल दिया है.’

अपने संदेश में उन्होंने कहा कि ईद-उल-अजहा त्याग और समर्पण का संदेश देती है और उम्मीद जताई कि यही भावना लोगों को इस कठिन समय में आगे बढ़ने की ताकत देगी. शेख हसीना ने कहा, ‘इस प्रतिकूल परिस्थिति में भी ये त्योहार हमें सच्चाई के रास्ते पर चलने और देश हित में जरूरी त्याग के लिए तत्पर रहने की ताकत देता है.’

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अवामी लीग ने हाल ही में आरोप लगाया था कि पार्टी से जुड़े लोगों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं और देश के कई हिस्सों में हिंसा का माहौल बना हुआ है. पार्टी का कहना है कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे लोगों के बीच असुरक्षा की भावना गहराती जा रही है. अवामी लीग के अनुसार जमीनी सच्चाई ये है कि कोई भी गलत काम न करने वाला शख्स जो हमारी पार्टी से जुड़ा है वो निशाने पर रहता है. हिंसा की वारदातों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

इसी महीने की शुरुआत में पार्टी ने दावा किया था कि इस साल भी 2025 की ही तरह महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसक वारदातों में वृद्धि हुई है. इसे सरकार की असफलता से जोड़ा गया था. हिंसा के पीछे व्यापक संस्थागत विफलता का आरोप लगाते हुए अवामी लीग ने कहा, ‘यह अब सिर्फ ‘महिलाओं का मुद्दा’ नहीं रह गया है. यह शासन व्यवस्था, न्याय प्रणाली और देश के नैतिक चरित्र में गिरावट का संकेत है.’

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