हजारों बम भी नहीं झुका पाए! बातचीत की मेज पर USA को मात दे गया ईरान? ट्रंप का पुराना बयान वायरल


US Iran Deal: जनवरी 2020 में डोनाल्ड ट्रंप ने एक बात कही थी, जो आज फिर चर्चा में है. ट्रंप ने कहा था कि ईरान शायद कोई जंग नहीं जीतता, लेकिन बातचीत में उसे हराना आसान नहीं होता. छह साल बाद अमेरिका और ईरान के बीच हुए नए समझौते ने इस बयान को फिर सुर्खियों में ला दिया है.

दरअसल, महीनों तक चली भीषण जंग में अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हजारों हवाई हमले किए, उसके सैन्य ठिकानों को तबाह किया और कई बड़े नेताओं को मार गिराया. पहली नजर में लगा कि ईरान पूरी तरह कमजोर पड़ गया है. लेकिन इसके बाद ईरान ने ऐसा दांव चला कि तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया और आखिरकार अमेरिका को बातचीत की मेज पर लौटना पड़ा. अब सवाल यही उठ रहा है कि क्या जंग के मैदान में नुकसान झेलने के बावजूद ईरान ने बातचीत में बाजी मार ली?

अमेरिका-इजरायल के हमले से शुरू हुई जंग

28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर करीब 900 समन्वित हवाई हमले किए. इन हमलों में तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर मारे गए. शुरुआती झटके के बाद ईरानी नेतृत्व ने खुद को फिर संगठित किया और खामेनेई के बेटे  मुज्तबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना.

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ईरान ने कैसे बनाया दबाव?

अमेरिका और इजरायल की सैन्य ताकत का मुकाबला करना मुश्किल था, इसलिए ईरान ने अलग रणनीति अपनाई. उसने इजरायल के साथ-साथ यूएई, सऊदी अरब, कुवैत और कतर जैसे देशों पर ड्रोन हमले किए. इसका मकसद क्षेत्रीय और आर्थिक दबाव बढ़ाना था. मार्च में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ. युद्ध से पहले 73 डॉलर प्रति बैरल रहने वाला ब्रेंट क्रूड अप्रैल में 126 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया. ईंधन और जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से दुनिया भर के उपभोक्ताओं पर असर पड़ा.

अमेरिका का दावा, लेकिन सवाल बरकरार

अमेरिका का कहना है कि उसने 13 हजार से अधिक हवाई हमले किए, 50 से ज्यादा ईरानी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और 300 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चर नष्ट किए. इसके अलावा 155 ईरानी नौसैनिक जहाज और गश्ती नौकाएं भी डुबो दी गईं. हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि ईरानी शासन का बने रहना और उसकी जवाबी क्षमता यह दिखाती है कि अमेरिका और इजरायल को निर्णायक सैन्य जीत नहीं मिली.

ट्रंप पर बढ़ा समझौते का दबाव

जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता गया, अमेरिका के भीतर और उसके सहयोगी देशों में इसे लेकर असंतोष बढ़ने लगा. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलवाने का दबाव भी बढ़ा. ऐसे में ट्रंप प्रशासन ने तेहरान के साथ समझौते का रास्ता तलाशना शुरू किया. आखिरकार फ्रांस के वर्साय में दोनों देशों के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए.

समझौते में किसकी जीत?

ट्रंप का मुख्य लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना था, लेकिन अंतिम ढांचा अभी 60 दिनों बाद तय होना है. दूसरी ओर ईरान को प्रतिबंधों में राहत, पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर का फंड और लेबनान में संघर्षविराम जैसे बड़े लाभ मिले हैं. विश्लेषकों के मुताबिक सबसे बड़ी रणनीतिक जीत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है. समझौते के अनुसार ईरान 60 दिनों तक जहाजों को बिना शुल्क गुजरने देगा, लेकिन इसके बाद शुल्क लगाने की संभावना उसके लिए भविष्य में राजस्व का बड़ा स्रोत बन सकती है.

 



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