क्या आपको याद है 28 फरवरी 2026 की वो सुबह, जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर अचानक हमले शुरू कर दिए थे? उस दिन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी तेल शक्तियों में से एक ने एक-दूसरे को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अब यह जंग 15 जून 2026 को शांति समझौते के साथ खत्म हुई. ठीक 107 दिन बाद, लेकिन इन साढ़े तीन महीनों में जो कुछ हुआ, उसने दुनिया का सांस लेना भी मुश्किल कर दिया. इस जंग में हुए जान-माल के हर नुकसान को समझते हैं. ये वो आंकड़े हैं जिन्हें देखकर आप खुद कहेंगे- ‘बस, अब और नहीं…’
इंसानी कहर: कितनी गईं जानें और कितने बिखरे?
युद्ध का कोई दर्दनाक चेहरा होता है तो वह होता है नागरिकों का खून. सबसे पहले बात उन इंसानों की जो अपने घरों में सो रहे थे, स्कूल की क्लास में थे या बस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी रहे थे. सबसे पुराने आंकड़ों में 15 मार्च 2026 की मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि अकेले पहले दस दिनों में ही 390 नागरिकों की मौत हो चुकी थी और 3,910 सैनिक भी मारे गए थे. सबसे दुखद हमला होरमोजगान प्रांत के शजरेह तय्येबेह गर्ल्स स्कूल पर हुआ, जहां अमेरिकी एयरस्ट्राइक में 175 मासूम बच्चियां मारी गईं.
तीसरे दिन अमेरिकी ह्यूमन राइट्स एजेंसी ने रिपोर्ट किया कि ईरान में 85 नागरिक और 11 सैनिक मारे गए थे. 26 अप्रैल तक यह आंकड़ा और भयानक हो चुका था. ईरानी मीडिया के मुताबिक, तब तक 3,468 लोग मारे जा चुके थे. इनमें 40% सिविलियन थे, जबकि 34,000 से ज्यादा लोग घायल थे. एक महीने के अंदर यह संख्या और बढ़ गई थी, जब अप्रैल तक 1,937 लोग और मारे जा चुके थे.
जंग के बाद जून 2026 में अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों ने एक अनुमान लगाया कि कुल 2,211 लोग मारे गए थे और 22,000 से ज्यादा जख्मी हुए. लेकिन सबसे बड़ा तो यह है कि ईरान के अंदर 3.9 मिलियन (39 लाख) लोग बेघर हो गए.
अमेरिका-ईरान जंग में मौत के आंकड़ों पर अलग-अलग वेबसाइट्स की राय भी अलग है. ईरान कॉस्ट टिकर के मुताबिक, 5 हजार से ज्यादा ईरानी सैनिक और 1,508 ईरानी नागरिक मारे गए, जबकि 21 हजार से ज्यादा लोग बेघर हुए. अमेरिका अब तक 1.12 ट्रिलियन डॉलर खर्च कर चुका है.
जंग में शामिल किस देश का नुकसान कितना हुआ?
- ईरान ने खोए सबसे ज्यादा लोग: युद्ध की शुरुआत में ही अमेरिका-इजरायली धमाकों ने 1,444 लोगों को मार डाला था. कुछ आपत्तिजनक तो यह था कि इसके बाद बंदर अब्बास में ईरान के कमांडरों सहित कई बड़े लोग भी निशाने पर थे. एक दिन पहले तक ये आंकड़े लगातार बदल रहे थे, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत था. यह दुनिया की सबसे बड़ी खुफिया घटना थी.
- इजरायल और अमेरिका का जवाब: ईरान ने अपने जवाब में ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4’ के तहत पूरे इजरायल में मिसाइलें बरसाईं. इसमें इजरायल के 15 नागरिक मारे गए और 3,300 से अधिक जख्मी हुए. वहीं, अमेरिकी पक्ष में 13 सैनिक मारे गए और 200 जवान घायल हुए. 18 मार्च को ईरान ने दावा किया कि अमेरिका को 3,200 हताहतों का नुकसान हुआ था, हालांकि यह सिर्फ प्रोपेगैंडा था.
- सबसे बड़ा शोक: मार्च में ही अमेरिका अपने सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर ‘USS जेराल्ड आर. फोर्ड’ पर आग का शिकार हुआ, जहां उसके कई केबिन जलकर खाक हो गए. अमेरिका चाहता था कि इसकी खबर न छपे, लेकिन CNN ने तस्वीरें जारी कर दीं.
अरबों डॉलर: जंग ने किसकी कितनी जेब जलाई?
अगर दुनिया कल्पना करती कि पूरी ग्लोबल इकोनॉमी एक सुपरटैंकर है, तो होर्मुज स्ट्रेट उसकी स्किन के नीचे नसें थी. इस युद्ध ने इन नसों को तोड़कर रख दिया. ईरान वॉर कॉस्ट ट्रैकर के मुताबिक:
- ग्लोबल GDP का खात्मा: इस जंग ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हर साल 2.2 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 2.3 मिलियन करोड़ रुपये) का नुकसान पहुंचाया है. अगर समझौता नहीं होता और युद्ध जारी रहता, तो यह नुकसान और भी बढ़कर 3.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाता.
- मिडिल ईस्ट की बर्बादी: युद्ध के महज एक महीने बाद अमेरिका और ईरान की टक्कर ने मिडिल ईस्ट की अर्थव्यवस्था को 120 अरब डॉलर से 194 अरब डॉलर के बीच का नुकसान पहुंचाया. यह उस पूरे इलाके की पूरे साल 2025 की ग्रोथ से भी ज्यादा है.
- होर्मुज का बंद होना: सबसे बड़ा आर्थिक झटका था होर्मुज स्ट्रेट का पूरी तरह ठप हो जाना. इस रास्ते से दुनिया के 20% तेल और गैस का आवागमन होता था. यहां से ट्रैफिक बंद होते ही कच्चे तेल की कीमत आसमान छू गई. ऑयल प्राइस फरवरी में 70-72 डॉलर प्रति बैरल था, जो जंग की वजह से 119 डॉलर पर पहुंच गया.
तीना भारतीय नाविकों की मौत और बिगड़ी अर्थव्यवस्था
भारत इस युद्ध का केंद्र तब बना जब सीधे 3 नाविक अमेरिकी हमले में मारे गए. 9-10 जून 2026 की दरम्यानी रात अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पलाऊ देश के झंडे वाले टैंकर MT Settebello पर रॉकेट दाग दिए. इस जहाज पर 24 भारतीय सवार थे. हमले के बाद भगदड़ मच गई. 21 भारतीय तो बच गए, लेकिन तीन- शिवानंद चौरसिया (उत्तर प्रदेश), आदित्य शर्मा (हिमाचल प्रदेश) और चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश (विजाग) नहीं बच सके.
अमेरिका ने दावा किया कि उसने नाकाबंदी में टैंकर को 60 बार चेतावनी दी थी, लेकिन उसने नहीं माना. भारत ने अमेरिकी राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध किया और जांच की मांग की. इससे पहले ही MT Marivex और MT Jalveer पर भी हमले हुए थे.
भारत पर आर्थिक असर भी कम नहीं था. भारत अपनी जरूरत का 88% कच्चा तेल आयात करता है, जिसका लगभग 50% हिस्सा खाड़ी देशों से होर्मुज के रास्ते आता था. तेल के दाम बढ़ने से भारत की GDP ग्रोथ के अनुमान 6.9 फीसदी से घटकर 6.5 फीसदी रह गए. मुख्य आर्थिक सलाहकार ने चेतावनी दी कि हालात और बिगड़े तो यह 6% से भी नीचे जा सकती है.
सैन्य तबाही: ईरानी नेवी को कितना नुकसान उठाना पड़ा?
युद्ध का एक और बड़ा चैप्टर सैन्य साधनों का था. अमेरिकी अटैक इतने करारे थे कि बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 51 मिलिट्री साइट्स पर हमले दर्ज किए गए. इनमें ईरान की वायु सेना के अड्डे, नेवल फैसिलिटी और IRGC कंपाउंड शामिल थे. बंदर अब्बास नेवल बेस पर हमले इतने भयानक थे कि ईरानी युद्धपोत तो बर्बाद हो गए, बल्कि पूरे बंदरगाह के ढांचे ढह गए.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने ‘ईरानी नेवी का सफाया कर दिया’ है. उनके दावे के अनुसार, 158 जहाज नष्ट किए गए. वहीं, सेंट्रल कमांड ने कम से कम 17 ईरानी वॉरशिप्स के डूबने का ऐलान किया.
दुनिया के जहाजों का क्या हुआ?
होर्मुज के रास्ते पूरी दुनिया के मर्चेंट नेवी (व्यापारिक जहाज) अटक गए थे. अकेले VLCC (बहुत बड़े क्रूड ऑयल टैंकरों) के 10% हिस्से फंस गए थे, जिसमें लगभग 20 मिलियन बैरल ऑयल का संकट पैदा हो गया था. अमेरिकी नाकेबंदी ने 8 जहाजों को तो तबाह कर दिया, लेकिन 134 और जहाजों को रास्ता बदलना पड़ा, जिससे फ्रेट कॉस्ट आसमान छू गई.
आखिरी शांति समझौते से पहले की तबाही कितनी?
14 जून 2026 को ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया, ‘दुनिया के जहाजों, अपने इंजन चालू कर लो. तेल को बहने दो.’ अमेरिका और ईरान के बीच 19 जून को शांति समझौता होने वाला है. लेकिन इसके ठीक पहले इतिहास में एक बार फिर बच्चों का कत्लेआम हुआ. 14 जून को बेरूत पर इजरायल के हमले में हिजबुल्लाह के कमांडरों के साथ 21 बच्चे और 4 महिलाएं मारी गईं. शायद यहीं से सबक सीखना चाहिए कि जब कुछ लोग हथियारों से फैसला करते हैं, तो मासूम बच्चे ही सबसे पहले जलते हैं.
1,000 अरब डॉलर के खर्च और 5,000 से ज्यादा मौतें
यह युद्ध दुनिया को बताने के लिए काफी था कि हथियार कभी समाधान नहीं होते. 107 दिनों में पांच हजार से ज्यादा इंसान मारे गए, अरबों डॉलर की संपत्ति का मलबा बिखर गया और दुनिया भर के बाजारों में महंगाई आसमान छू गई. जब 19 जून को जिनेवा में कलम चलेगी, तो उम्मीद जगेगी. लेकिन साथ ही, यह भी याद रखा गया कि जंग के धुएं में केवल मासूम बच्चों की लाशें और टूटे हुए परिवार ही बचते हैं.