Republic Day 2026: चौंकाने वाला सच! 1955 में भारत के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि थे पाकिस्तान के गवर्नर जनरल, मगर क्यों?


आज भारत 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. हर वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाने वाला यह राष्ट्रीय पर्व संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक माना जाता है. समय के साथ गणतंत्र दिवस से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य सामने आए हैं, जिनमें से कुछ आज के दौर में बेहद चौंकाने वाले लगते हैं. ऐसा ही एक तथ्य वर्ष 1955 से जुड़ा है, जब भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे.

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक साल 1955 वह समय था जब भारत और पाकिस्तान के विभाजन को केवल 7 से 8 वर्ष ही बीते थे. दोनों देशों के बीच कश्मीर सहित कई मुद्दों को लेकर तनाव बना हुआ था. इसके बावजूद भारत अपनी नई लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूती देने में जुटा हुआ था. इसी दौर में भारत सरकार ने गणतंत्र दिवस समारोह के लिए पाकिस्तान के सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारी को आमंत्रित किया. यह समारोह उस समय राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है, पर आयोजित किया गया था.

मलिक गुलाम मोहम्मद का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

मलिक गुलाम मोहम्मद का जीवन विभाजन से पहले के भारत से जुड़ा रहा. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी और ब्रिटिश शासन के दौरान चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में काम किया. उन्होंने भारतीय रेलवे लेखा सेवा में भी कार्य किया और बाद में हैदराबाद के निज़ाम के वित्तीय सलाहकार रहे. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए, जहां उन्होंने देश की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

पाकिस्तान की राजनीति में भूमिका

1947 के बाद मलिक गुलाम मोहम्मद पाकिस्तान के पहले वित्त मंत्री बने. वर्ष 1951 में प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या के बाद ख्वाजा नाजिमुद्दीन प्रधानमंत्री बने और उसी दौरान मलिक गुलाम मोहम्मद को पाकिस्तान का गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया. उनका कार्यकाल पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में काफी विवादास्पद माना जाता है. उन्होंने 1953 में प्रधानमंत्री ख्वाजा नाजिमुद्दीन की सरकार को बर्खास्त कर दिया और 1954 में पाकिस्तान की संविधान सभा को भंग कर दिया. संविधान सभा गवर्नर जनरल की शक्तियों को सीमित करना चाहती थी, जिसके चलते यह टकराव सामने आया. इन फैसलों में तत्कालीन सैन्य नेतृत्व का समर्थन भी शामिल था, जिसमें जनरल अयूब खान की भूमिका अहम मानी जाती है, जो आगे चलकर पाकिस्तान के सेना प्रमुख और राष्ट्रपति बने.

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